Samachar Post रिपोर्टर, हजारीबाग : पर्यावरण संरक्षण को लेकर हजारीबाग में ‘मेरी धरती, मेरी जिम्मेदारी’ समूह की पहल अब दुर्लभ और पारंपरिक प्रजातियों के संरक्षण तक पहुंच रही है। समूह से जुड़े पर्यावरण प्रेमी डॉ. मनोज कुमार के नेतृत्व में शहर के अलग-अलग सार्वजनिक स्थलों पर विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इनमें दुर्लभ कल्पतरु के साथ चालता, नागकेसर, सीता अशोक और पीपल के पौधे शामिल हैं।
समाहरणालय परिसर में लगाए गए करीब 30 कल्पतरु
डॉ. मनोज कुमार के मुताबिक, समाहरणालय परिसर में करीब 30 कल्पतरु के पौधे लगाए गए हैं। इनमें से कुछ पौधे करीब दो वर्ष पहले लगाए गए थे और अब शुरुआती अवस्था से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि रांची में मौजूद तीन कल्पतरु के पेड़ों से बीज एकत्र कर इन पौधों को तैयार किया गया था। हजारीबाग में कल्पतरु का शुरुआती रोपण बूढ़ा महादेव तालाब परिसर में किया गया, जहां करीब आठ पौधे लगाए गए हैं। समाहरणालय परिसर में लगाए गए पौधों को सुरक्षित रखने के लिए बांस का घेरा भी बनाया गया है।
शहर के अलग-अलग हिस्सों में 900 से अधिक पीपल के पौधे
समूह की ओर से शहर के कई इलाकों में बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया गया है। चारो झील के आसपास करीब 900 पौधे लगाए गए हैं। इसके अलावा स्टेडियम, गांधी मैदान, बूढ़ा महादेव तालाब, जिला बोर्ड से झारखंड क्राफ्ट तक और समाहरणालय परिसर समेत कई जगहों पर पौधे लगाए गए हैं। मेडिकल कॉलेज, सर्किट हाउस, पुलिस हाउस और विभिन्न शिक्षण संस्थानों के आसपास भी पौधरोपण किया गया है। डॉ. मनोज कुमार के अनुसार, समूह ने करीब 25-25 चालता और नागकेसर के पौधे लगाए हैं। इसके अलावा सीता अशोक के पौधे भी अलग-अलग स्थानों पर लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि शहर में लगभग 900 पीपल के पौधे लगाए गए हैं, जिनमें 800 से अधिक अब विकसित हो रहे हैं। इन पौधों के आसपास पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए प्राकृतिक वातावरण तैयार होने की बात भी उन्होंने कही।
पौधों की सुरक्षा और देखभाल पर जोर
डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि पौधों को शुरुआती अवस्था में विशेष संरक्षण की जरूरत होती है। जब तक पौधे मजबूत होकर वृक्ष का रूप नहीं ले लेते, तब तक उनकी सुरक्षा और नियमित देखभाल जरूरी है। उन्होंने समाहरणालय परिसर की साफ-सफाई और झाड़ियों की कटाई को लेकर जिला प्रशासन की ओर से दिए गए निर्देश का भी उल्लेख किया।
विकास के साथ पेड़ों का संरक्षण भी जरूरी
डॉ. मनोज कुमार ने सड़क निर्माण और दूसरी विकास परियोजनाओं के दौरान पेड़ों की कटाई को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन इसके साथ प्रकृति और संस्कृति के बीच संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में प्रकृति को जीवन का सहचर माना गया है। पुराने और बड़े पेड़ों को धरोहर के रूप में संरक्षित करने की जरूरत है। झारखंड की पहचान जंगल और पेड़ों से जुड़ी है, इसलिए विकास कार्यों के दौरान पुराने पेड़ों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की कि पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी निभाएं। उनका कहना है कि केवल पौधरोपण करने से हरित क्षेत्र तैयार नहीं होता, बल्कि पौधों के पेड़ बनने तक उनका संरक्षण भी जरूरी है।























