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झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: विपरीत परिस्थितियों में पत्नी को पति के घर लौटने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता

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Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने मुस्लिम वैवाहिक कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि पत्नी को वैवाहिक घर वापस भेजना अन्यायपूर्ण या असुरक्षित होगा, तो अदालत उसे पति के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। कोर्ट ने इस संबंध में गिरिडीह फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। यह फैसला जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में दिए गए दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया।

2013 में हुआ था विवाह

मामला रानी परवीन और मोहम्मद मुबारक अंसारी से जुड़ा है, जिनका विवाह वर्ष 2013 में मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि उनकी पत्नी बिना किसी उचित कारण के वैवाहिक घर छोड़कर चली गई है और समझाने के बावजूद वापस नहीं लौट रही है। दूसरी ओर, पत्नी ने पति और ससुराल पक्ष पर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, मारपीट तथा क्रूरता के आरोप लगाए थे। महिला ने इस संबंध में आपराधिक मामला भी दर्ज कराया था और बाद में काजी के माध्यम से ‘खुला’ प्राप्त करने की बात कही थी।

मुस्लिम कानून में राहत स्वतः नहीं मिलती

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत विवाह एक नागरिक अनुबंध (Civil Contract) माना जाता है। हालांकि पति दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग कर सकता है, लेकिन अदालत द्वारा ऐसी राहत स्वतः प्रदान नहीं की जा सकती। खंडपीठ ने कहा कि अदालत को यह जांचना आवश्यक है कि पत्नी के अलग रहने के पीछे कोई वैध और उचित कारण है या नहीं। यदि पत्नी ने क्रूरता, घरेलू हिंसा या उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं और परिस्थितियां उसके लिए वैवाहिक घर में रहना असुरक्षित बनाती हैं, तो उसे जबरन वापस भेजना उचित नहीं होगा।

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फैमिली कोर्ट को परिस्थितियों का समग्र आकलन करना चाहिए

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट केवल तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर निर्णय नहीं ले सकता। वैवाहिक विवादों की सुनवाई करते समय अदालतों को पूरे मामले की पृष्ठभूमि, संबंधों की वास्तविक स्थिति और विवाद के मूल कारणों का भी आकलन करना चाहिए। कोर्ट ने माना कि गिरिडीह फैमिली कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया था। इसी आधार पर खंडपीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली।

महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जाएगा जहां पत्नी घरेलू हिंसा, प्रताड़ना या असुरक्षित माहौल का हवाला देते हुए अलग रह रही हो। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है और न्यायालय को प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।

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Rupa Kumari

Reporter | Samachar Postमैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।See Profile

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