पुण्यतिथि विशेष: नेमरा से उठी वह आवाज, जो ‘दिशोम गुरु’ बनकर झारखंड की पहचान बन गई

Rupa Kumari | August 4, 2026 | 11:40 AM IST

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड के इतिहास में कुछ नाम केवल राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक आंदोलन, एक विचार और एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। दिशोम गुरु शिबू सोरेन ऐसा ही एक नाम हैं। आदिवासी समाज के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की लड़ाई और अलग झारखंड राज्य के निर्माण के संघर्ष में उनकी भूमिका हमेशा स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगी। उनकी पहली पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उस महानायक को श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है, जिसने नेमरा गांव से निकलकर देशभर के आदिवासियों की आवाज बनने तक का सफर तय किया।

नेमरा की मिट्टी से निकला जननायक

11 जनवरी 1944 को तत्कालीन संयुक्त बिहार के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन बचपन से ही सामाजिक चेतना और संघर्ष के वातावरण में पले-बढ़े। उनके पिता सोबरन सोरेन एक शिक्षक होने के साथ-साथ सामाजिक अन्याय और महाजनी शोषण के खिलाफ आवाज उठाते थे। पिता के विचारों का गहरा प्रभाव बालक शिबू पर पड़ा। साल 1957 में पिता की हत्या ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। इस घटना ने उन्हें अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने व्यक्तिगत प्रतिशोध की बजाय सामाजिक बदलाव को अपना लक्ष्य बनाया और आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई में खुद को समर्पित कर दिया।

महाजनी प्रथा के खिलाफ शुरू किया आंदोलन

युवा अवस्था में ही शिबू सोरेन ने आदिवासियों की जमीन बचाने और उन्हें आर्थिक शोषण से मुक्त कराने के लिए अभियान शुरू किया। 1960 के दशक में उन्होंने संताल नवयुवक संघ के माध्यम से महाजनी और साहूकारी व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। गांव-गांव जाकर उन्होंने लोगों को जागरूक किया और अपनी जमीन तथा अधिकारों के प्रति सजग रहने का संदेश दिया। उनके नेतृत्व में चला धनकटनी आंदोलन आदिवासी समाज में आत्मविश्वास और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। इस आंदोलन ने शोषणकारी व्यवस्थाओं को चुनौती दी और हजारों लोगों को अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा दी।

समाज सुधार को बनाया मिशन

शिबू सोरेन ने केवल आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि सामाजिक सुधार को भी अपनी प्राथमिकता बनाया। उन्होंने आदिवासी समाज में बढ़ती नशाखोरी को गंभीर समस्या मानते हुए नशामुक्ति अभियान चलाया। इसके लिए उन्होंने सोनोत संताल समाज का गठन किया और लोगों को शराब व अन्य नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना। ग्रामीण क्षेत्रों में रात्रि पाठशालाओं की शुरुआत कर उन्होंने अशिक्षा के खिलाफ अभियान चलाया। उनका विश्वास था कि शिक्षित समाज ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर शोषण का मुकाबला कर सकता है। समाज सुधार, शिक्षा, नशामुक्ति और आदिवासी अधिकारों के लिए लगातार किए गए कार्यों ने उन्हें आदिवासी समाज के बीच असाधारण सम्मान दिलाया। लोगों ने उन्हें प्रेम और श्रद्धा से ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दी। यह केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि उनके प्रति समाज के विश्वास और सम्मान का प्रतीक था।

झारखंड आंदोलन को दी नई दिशा

शिबू सोरेन का मानना था कि आदिवासी समाज के विकास और सम्मान के लिए राजनीतिक स्वायत्तता आवश्यक है। इसी सोच के साथ उन्होंने 1973 में बिनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। झामुमो के माध्यम से अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित और व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप मिला। वर्षों के संघर्ष, आंदोलन और राजनीतिक प्रयासों के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के प्रमुख नायकों में शिबू सोरेन का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है।

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राजनीति में भी छोड़ी अमिट छाप

दिशोम गुरु का राजनीतिक सफर भी उतना ही प्रभावशाली रहा। वे आठ बार लोकसभा सांसद चुने गए, चार बार राज्यसभा सदस्य रहे और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। केंद्र सरकार में उन्होंने कोयला मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आने के बावजूद उन्होंने आदिवासी समाज, स्थानीय पहचान और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों की आवाज को कभी कमजोर नहीं होने दिया।

विचारों में जीवित रहेंगे गुरुजी

4 अगस्त 2025 को उनके निधन के साथ एक युग का अंत जरूर हुआ, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और विरासत आज भी झारखंड की राजनीति और समाज में जीवित हैं। उन्होंने आदिवासी समाज को आत्मसम्मान, अधिकार और संघर्ष की नई पहचान दी। दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प, सामाजिक प्रतिबद्धता और जनसेवा के बल पर कोई भी व्यक्ति इतिहास में अमिट छाप छोड़ सकता है। झारखंड के लाखों लोगों के लिए वे आज भी केवल एक नेता नहीं, बल्कि सम्मान, संघर्ष और स्वाभिमान के प्रतीक हैं।

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