Samachar Post रिपोर्टर,पश्चिमी सिंहभूम : पश्चिमी सिंहभूम के दूरदराज गांव से निकलकर 24 वर्षीय शेखर गोप ने लद्दाख की 20 हजार फीट से अधिक ऊंची ज़ो-जोंगो चोटी पर तिरंगा फहराकर मिसाल कायम की है। जन्म से 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित शेखर के लिए कभी अकेले घर से निकलना भी चुनौती हुआ करता था, लेकिन आज उनके कदम हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंच चुके हैं। उनके साथ अभियान में शामिल 23 वर्षीय दृष्टिबाधित धीरोज कुमार 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचे, लेकिन तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें बेस कैंप में रुकना पड़ा।
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पश्चिमी सिंहभूम के गांवों से शुरू हुआ हिमालय तक का सफर
शेखर गोप और धीरोज कुमार का यह सफर लद्दाख से नहीं, बल्कि पश्चिमी सिंहभूम के तोड़ानहातु और कड़ाजामदा जैसे दूरदराज गांवों से शुरू हुआ। सीमित सुविधाओं के बीच पले-बढ़े दोनों युवाओं के लिए रोजमर्रा की जिंदगी में आत्मनिर्भर होना भी आसान नहीं था। सफेद छड़ी जैसी बुनियादी सुविधा तक आसानी से उपलब्ध नहीं थी और बिना किसी की मदद के एक जगह से दूसरी जगह जाना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। वर्ष 2022 में दोनों टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांगजनों के समावेशन से जुड़ी पहल ‘सबल’ से जुड़े। इसके बाद उनके जीवन में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। उन्होंने ब्रेल पढ़ना, स्वतंत्र रूप से आवागमन करना और स्मार्टफोन व डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करना सीखा।
शेखर बने झारखंड ब्लाइंड फुटबॉल टीम के कप्तान
आत्मनिर्भरता के साथ शेखर और धीरोज ने खेल के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। आउटडोर प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने दोनों को कठिन परिस्थितियों में टीम के साथ काम करने और नेतृत्व करने का आत्मविश्वास दिया। शेखर आगे चलकर झारखंड ब्लाइंड फुटबॉल टीम के कप्तान बने। वहीं धीरोज कुमार राष्ट्रीय स्तर के ब्लाइंड फुटबॉल खिलाड़ी के तौर पर झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। खेल के अनुभव और प्रशिक्षण ने दोनों को आगे की बड़ी चुनौती के लिए तैयार किया।
दलमा हिल्स में हुई थी पर्वतारोहण की तैयारी
ज़ो-जोंगो अभियान के लिए चयनित होने के बाद दोनों युवाओं ने दलमा हिल्स में प्री-एक्सपीडिशन प्रशिक्षण लिया। इस दौरान शारीरिक क्षमता और सहनशक्ति बढ़ाने के साथ कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में खुद को संभालने की ट्रेनिंग दी गई। इसके बाद दोनों ने लद्दाख की ऊंची और कठिन पर्वतीय परिस्थितियों का सामना किया, जहां कम ऑक्सीजन, जमा देने वाली ठंड और ऊबड़-खाबड़ रास्ते हर कदम पर परीक्षा ले रहे थे।

16,732 फीट पर रुके धीरोज, शेखर ने जारी रखा सफर
अभियान के दौरान धीरोज की तबीयत बिगड़ गई। उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में रुकना पड़ा। इसके बावजूद शेखर ने हिम्मत नहीं छोड़ी और अपना अभियान जारी रखा। कठिन परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ते हुए शेखर आखिरकार 20 हजार फीट से अधिक ऊंची ज़ो-जोंगो चोटी पर पहुंचे और वहां तिरंगा फहराया। 25 अगस्त से शुरू हुआ यह अभियान 31 अगस्त को पूरा हुआ।
कभी सहारे के मोहताज थे, आज दूसरों का बन रहे सहारा
शेखर के लिए यह उपलब्धि सिर्फ एक पर्वतारोहण अभियान की सफलता नहीं है। जिस युवक के लिए कभी स्वतंत्र रूप से चलना भी बड़ी चुनौती था, उसने अब हजारों फीट ऊंचे हिमालय पर अपनी क्षमता का परिचय दिया है। वहीं, स्वास्थ्य कारणों से धीरोज भले ही शिखर तक नहीं पहुंच सके, लेकिन 16,732 फीट की ऊंचाई तक उनका पहुंचना भी उनके संघर्ष, तैयारी और हौसले की बड़ी मिसाल है। दोनों युवाओं की कहानी बताती है कि किसी व्यक्ति की क्षमता केवल उसकी शारीरिक स्थिति से तय नहीं होती। सही अवसर, प्रशिक्षण और सहयोग मिले तो दूरदराज गांव का दृष्टिबाधित युवा भी हिमालय की ऊंचाइयों को चुनौती दे सकता है। आज शेखर और धीरोज मोबिलिटी ट्रेनर के तौर पर दूसरे दृष्टिबाधित लोगों को आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। यानी जिस सफर में कभी उन्हें दूसरों के सहारे की जरूरत थी, उसी सफर में अब वे दूसरे लोगों के लिए सहारा बन चुके हैं।

Reporter | Samachar Post


