सरहुल 2026: प्रकृति, संस्कृति और सूर्य-धरती के पवित्र मिलन का उत्सव

Samachar Post रिपोर्टर,गुमला :झारखंड में आदिवासी समाज का प्रमुख प्रकृति पर्व सरहुल पूरे उत्साह और पारंपरिक धूमधाम के साथ मनाने की तैयारियां जोरों पर हैं। यह पर्व न सिर्फ आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव और संतुलित जीवन का संदेश भी देता है। सरहुल को सूर्य और धरती के विवाह के रूप में मनाया जाता है और इसे आदिवासी नववर्ष की शुरुआत भी माना जाता है। इस दिन सरना स्थल पर विशेष पूजा की जाती है, जहां वर्षा और कृषि की संभावनाओं का आकलन किया जाता है। यह पर्व लोगों को प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखने की सीख देता है।

एकता और परंपरा का उत्सव

केंद्रीय सरहुल संचालन समिति के अनुसार, सरहुल को “खद्दी” भी कहा जाता है। पर्व की पूर्व संध्या पर पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जहां लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में एकजुट होकर संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं। यह सामूहिकता और सामाजिक एकता का प्रतीक है।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश

आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति संरक्षण की परंपरा को निभाता आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक समय में बढ़ती बीमारियों का कारण प्रकृति से छेड़छाड़ है। ऐसे में सरहुल हमें पर्यावरण बचाने का महत्वपूर्ण संदेश देता है। गुमला में 21 मार्च को सरहुल महोत्सव के तहत भव्य सांस्कृतिक जुलूस निकाला जाएगा। सुबह 11 बजे पूजा, दोपहर 1 बजे प्रसाद वितरण, 2 बजे से जुलूस (उरांव क्लब, दुंदुरिया से शुरू) निकाला जाएगा। जुलूस में विभिन्न “खोड़हा दल” भाग लेंगे और बेहतरीन प्रदर्शन करने वालों को सम्मानित किया जाएगा।

परंपरा को प्राथमिकता

इस वर्ष आयोजन को पारंपरिक स्वरूप देने के लिए डीजे, नशापान और अबीर के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। युवा नेताओं ने लोगों से प्रकृति संरक्षण की अपील की है। उनका कहना है कि सरहुल सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि पर्यावरण और जीवन के संतुलन का संदेश है।

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