झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: SC-ST एक्ट की व्याख्या पर बड़ा आदेश, DGP ने बुलाई हाई-लेवल बैठक

Meenu | July 19, 2026 | 12:21 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर,रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC-ST Act) की व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि यदि किसी घटना में आरोपित व्यक्तियों के समूह में स्वयं अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्य भी शामिल हों, तो केवल इस आधार पर स्वतः SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता। प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया जाएगा। इसी आदेश के अनुपालन और राज्य में SC-ST एक्ट के तहत दर्ज मामलों की समीक्षा के लिए झारखंड के पुलिस महानिदेशक (DGP) ने 21 जुलाई को उच्च स्तरीय बैठक बुलाई है।

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क्या था पूरा मामला?

यह मामला अली अंसारी उर्फ मोहम्मद अली हुसैन एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य (क्रिमिनल अपील (एसजे) संख्या 67/2021) से जुड़ा है। बोकारो के सेक्टर-12 थाना में वर्ष 2020 में दर्ज एक प्राथमिकी के बाद आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया था। निचली अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा। आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के साथ SC-ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(u) के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि जिस समूह के खिलाफ आरोप लगाए गए थे, उसमें कुछ सदस्य स्वयं SC/ST समुदाय से संबंधित थे। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में SC-ST एक्ट के प्रावधानों की लागू होने की स्थिति का आकलन मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाएगा। इसी आधार पर अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपियों को निचली अदालत के समक्ष निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया और शर्तों के साथ जमानत देने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन और राज्य में SC-ST एक्ट से जुड़े मामलों की समीक्षा के लिए DGP ने सभी जिलों के SSP और SP को आवश्यक आंकड़ों के साथ बैठक में शामिल होने का निर्देश दिया है।

बैठक में इन मुद्दों पर होगी समीक्षा

बैठक में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर चर्चा होगी:

  • SC-ST एक्ट के तहत लंबित मामलों की स्थिति।
  • सुपरविजन और जांच रिपोर्ट लंबित मामलों की समीक्षा।
  • गिरफ्तारी, वारंट, कुर्की-जब्ती और इश्तेहार से जुड़े लंबित मामलों की जानकारी।
  • पीड़ितों को मुआवजा, सहायता और पुनर्वास की वर्तमान स्थिति।
  • पिछले पांच वर्षों में फास्ट ट्रैक कोर्ट, स्पीडी ट्रायल और दोषसिद्धि के आंकड़े।
  • जांच में झूठे पाए गए मामलों का विवरण।
  • अधिनियम की धारा 15(A)(3) के तहत पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों एवं सुरक्षा प्रावधानों के अनुपालन की समीक्षा।
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