Samachar Post रिपोर्टर,रांची :झारखंड हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाकर्ता शिव शंकर शर्मा को बड़ा झटका देते हुए उनकी रिव्यू याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका में किसी प्रकार की स्पष्ट कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई, जिसके आधार पर पहले दिए गए फैसले की समीक्षा की जा सके। इसके साथ ही कोर्ट ने पहले से लगाए गए 50 हजार रुपये के जुर्माने को भी बरकरार रखा।
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पहले के फैसले को दी थी चुनौती
शिव शंकर शर्मा ने हाईकोर्ट के 9 मई 2025 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी, जिसमें उनकी जनहित याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए खारिज कर दिया गया था। उन्होंने विशेष रूप से अदालत की उन टिप्पणियों पर आपत्ति जताई थी, जिनमें उनकी याचिका की मंशा और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए थे। साथ ही, उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए 50 हजार रुपये के जुर्माने को भी हटाने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता की दलीलें खारिज
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनकी जनहित याचिका की पात्रता और मंशा की जांच पहले ही हो चुकी थी, इसलिए बाद में उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाना उचित नहीं है। हालांकि, खंडपीठ ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि रिव्यू याचिका में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि मूल फैसले में कोई स्पष्ट कानूनी गलती हुई हो।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के एक पूर्व निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें याचिकाकर्ता की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने की पात्रता) पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि पूर्व टिप्पणियां यह स्पष्ट करती हैं कि याचिकाकर्ता की मंशा और आचरण पहले भी न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में जांचे जा चुके हैं। अदालत ने यह भी कहा कि जब मूल फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाई गई, तो 50 हजार रुपये के जुर्माने को हटाने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जुर्माने की राशि समय पर जमा नहीं की गई, जो न्यायिक प्रक्रिया के प्रति गंभीरता को दर्शाता है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका का उद्देश्य सार्वजनिक हित की रक्षा करना है, लेकिन इसका उपयोग निजी स्वार्थ या दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सख्ती जरूरी है ताकि जनहित याचिकाओं की विश्वसनीयता बनी रहे। अंत में अदालत ने रिव्यू याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया और कोई अतिरिक्त आदेश नहीं दिया।

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