रांची में स्थापित हुआ बिहार-झारखंड का पहला अत्याधुनिक डिस्ड्रोमीटर, अब होगी वर्षा की हर बूंद की निगरानी

Rupa Kumari | August 21, 2026 | 04:45 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के रांची केंद्र में बिहार-झारखंड क्षेत्र का पहला अत्याधुनिक डिस्ड्रोमीटर स्थापित किया गया है। यह उन्नत वर्षामापन उपकरण वर्षा की सूक्ष्म भौतिक विशेषताओं का अध्ययन करने और उच्च-रिज़ॉल्यूशन वर्षा डेटा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। मौसम विज्ञान के क्षेत्र में इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। यह पहल भारत में आधुनिक वर्षा अवलोकन नेटवर्क को मजबूत करने और वर्षा से जुड़ी जटिल प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझने की दिशा में अहम कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे मौसम पूर्वानुमान और वर्षा विश्लेषण की सटीकता में भी सुधार होगा।

क्या है डिस्ड्रोमीटर?

डिस्ड्रोमीटर एक अत्याधुनिक उपकरण है जो वर्षा की बूंदों के आकार, संख्या और उनकी गति का सटीक मापन करता है। इसके माध्यम से वर्षा की तीव्रता, बूंदों के आकार का वितरण और कुल वर्षा जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं। यह उपकरण केवल वर्षा की मात्रा ही नहीं, बल्कि उसकी संरचना और प्रकृति को भी समझने में मदद करता है, जिससे वैज्ञानिकों को मौसम संबंधी घटनाओं का अधिक सटीक विश्लेषण करने का अवसर मिलता है।

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IITM और IMD के सहयोग से हुई स्थापना

इस उपकरण की स्थापना भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे के वैज्ञानिक डॉ. अंबुज कुमार झा और परियोजना वैज्ञानिक रोहित पाटिल द्वारा की गई। इस कार्य में आईएमडी रांची की टीम ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। स्थापना के दौरान आईएमडी रांची के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. बाबूराज, वरिष्ठ वैज्ञानिक अभिषेक आनंद समेत कई अधिकारी मौजूद रहे।

‘मिशन मौसम’ परियोजना का हिस्सा

यह डिस्ड्रोमीटर नेटवर्क IITM पुणे की ART परियोजना के तहत विकसित किया जा रहा है, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की महत्वाकांक्षी ‘मिशन मौसम’ पहल का हिस्सा है। इस नेटवर्क का उद्देश्य देश के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में वर्षा की सूक्ष्म संरचना और सूक्ष्मभौतिकीय विशेषताओं का अध्ययन करना है, ताकि मौसम पूर्वानुमान और वर्षा विश्लेषण को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

झारखंड में वर्षा अध्ययन को मिलेगा नया आयाम

रांची और झारखंड क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी से बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्रों तथा मानसूनी प्रणालियों के कारण अक्सर भारी वर्षा होती है। इसके अलावा गरज-चमक के साथ होने वाली संवहनीय वर्षा भी यहां आम है। विशेषज्ञों के अनुसार, डिस्ड्रोमीटर की मदद से इन विभिन्न मौसम प्रणालियों के दौरान वर्षा की संरचना और व्यवहार का विस्तृत अध्ययन किया जा सकेगा। इससे रडार आधारित वर्षा आकलन, मौसम अवलोकन और पूर्वानुमान मॉडल को और अधिक सटीक बनाने में सहायता मिलेगी।आईआईटीएम पुणे के वैज्ञानिक डॉ. अंबुज कुमार झा ने कहा कि इस उपकरण की स्थापना से रांची और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा निगरानी की क्षमता मजबूत होगी तथा क्षेत्रीय मौसम अनुसंधान को नई दिशा मिलेगी।

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