Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के शीर्ष नेता रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर पूरा राज्य उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। आदिवासी अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अलग झारखंड राज्य के निर्माण के लिए उनका संघर्ष भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
आंदोलन से नेतृत्व तक का सफर
11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने कम उम्र में ही सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की राह चुन ली थी। वर्ष 1962 में उन्होंने संताल नवयुवक संघ की स्थापना की और आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया। 1970 के दशक में भूमि अधिकारों और स्थानीय पहचान के सवाल पर उनके नेतृत्व में व्यापक जनआंदोलन खड़ा हुआ। वर्ष 1973 में बिनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में वे पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे और दशकों तक संगठन को वैचारिक दिशा देते रहे।
अलग झारखंड राज्य के निर्माण में अहम भूमिका
झारखंड राज्य की मांग को जनआंदोलन का स्वरूप देने में शिबू सोरेन का योगदान निर्णायक रहा। लंबे संघर्ष और राजनीतिक प्रयासों के बाद 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ। इस उपलब्धि ने उन्हें झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े प्रतीकों में शामिल कर दिया।आदिवासी समाज के बीच उनकी लोकप्रियता इतनी व्यापक थी कि उन्हें सम्मानपूर्वक “दिशोम गुरु” की उपाधि दी गई। उन्होंने हमेशा स्थानीय लोगों के अधिकार, शिक्षा, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों पर उनके हक की आवाज बुलंद की।

संसद से मुख्यमंत्री पद तक
शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर संघर्षों और उपलब्धियों से भरा रहा। वे दुमका लोकसभा क्षेत्र से कई बार सांसद चुने गए और राष्ट्रीय राजनीति में झारखंड की मजबूत आवाज बने। उन्होंने केंद्र सरकार में कोयला मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। झारखंड राज्य बनने के बाद वे तीन बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उनका कार्यकाल कई बार बाधित हुआ, लेकिन उन्होंने राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाए रखी।
झामुमो को दी नई पहचान
झामुमो को एक क्षेत्रीय आंदोलन से निकालकर राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनाने का श्रेय भी काफी हद तक शिबू सोरेन को दिया जाता है। उनके नेतृत्व में पार्टी ने संगठनात्मक विस्तार किया और झारखंड की राजनीति में स्थायी स्थान बनाया। आज झामुमो की मजबूत राजनीतिक मौजूदगी को उनकी सबसे बड़ी विरासत माना जाता है।
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हमेशा याद किए जाएंगे दिशोम गुरु
शिबू सोरेन का जीवन केवल राजनीतिक पदों तक सीमित नहीं था। उन्होंने आदिवासी समाज के सम्मान, अधिकार और सामाजिक न्याय के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया। उनके संघर्ष, विचार और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। झारखंड के लाखों लोगों के लिए वे आज भी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि “दिशोम गुरु” के रूप में सम्मान और श्रद्धा के प्रतीक हैं।

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मैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।

