रांची में दर्दनाक हादसा: बंद कमरे में जलता रहा कोयले का चूल्हा, दम घुटने से मां-बेटे की मौत

Meenu | July 19, 2026 | 11:07 AM IST

Samachar Post रिपोर्टर,रांची : राजधानी रांची के रातू थाना क्षेत्र स्थित चटकपुर के पोखरटोली में एक दर्दनाक हादसे में 30 वर्षीय पिंकी देवी और उनके दो वर्षीय बेटे श्रवण कुमार की कार्बन मोनोऑक्साइड गैस से दम घुटने के कारण मौत हो गई। वहीं, परिवार की दो अन्य सदस्य गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। पुलिस ने मामले में अप्राकृतिक मौत (यूडी) का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

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बंद कमरे में जलता रह गया कोयले का चूल्हा

जानकारी के अनुसार, शुक्रवार रात पिंकी देवी अपने दोनों बच्चों और 15 वर्षीय ननद चंदा कुमारी के साथ एक कमरे में सो रही थीं। उसी कमरे में कोयले के चूल्हे पर खाना बनाया गया था। परिजनों का कहना है कि सामान्य दिनों में खाना बनने के बाद चूल्हा बाहर रख दिया जाता था, लेकिन तेज बारिश के कारण इस बार चूल्हा कमरे के अंदर ही रह गया। रातभर बंद कमरे में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस भरती रही, जिससे यह हादसा हो गया।

सुबह दरवाजा नहीं खुला तो हुआ हादसे का खुलासा

शनिवार सुबह काफी देर तक कमरे का दरवाजा नहीं खुला। आवाज देने पर भी अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद परिजनों और पड़ोसियों ने एसबेस्टस की शीट हटाकर कमरे में प्रवेश किया। अंदर चारों लोग बेहोशी की हालत में मिले। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने पिंकी देवी और उनके बेटे श्रवण कुमार को मृत घोषित कर दिया। घटना में घायल 15 वर्षीय चंदा कुमारी और चार वर्षीय प्राची कुमारी की हालत गंभीर बनी हुई है। दोनों का इलाज रिम्स में चल रहा है।

10 दिन पहले ही शुरू की थी नई नौकरी

परिजनों के अनुसार, पिंकी देवी ने करीब छह वर्ष पहले प्रेम विवाह किया था। दो वर्ष पहले उनके पति चंदन साव की आत्महत्या के बाद वह अपने बच्चों और सास-ससुर के साथ किराए के मकान में रह रही थीं। परिवार अभी उस सदमे से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि यह हादसा हो गया। पिंकी देवी ने करीब दस दिन पहले ही अपर बाजार स्थित एक कपड़ा दुकान में नौकरी शुरू की थी। परिवार मजदूरी और उनकी नौकरी से घर का खर्च चला रहा था, लेकिन नई शुरुआत के कुछ ही दिनों बाद यह दुखद घटना हो गई।

कैसे होती है कार्बन मोनोऑक्साइड से मौत?

विशेषज्ञों के अनुसार, कोयला जलने पर कार्बन मोनोऑक्साइड गैस निकलती है। यह रंगहीन और गंधहीन होने के कारण आसानी से महसूस नहीं होती। बंद कमरे में इसकी मात्रा बढ़ने पर पहले चक्कर, सिरदर्द और बेहोशी आती है। समय पर ताजी हवा और इलाज नहीं मिलने पर दम घुटने से जान भी जा सकती है।

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