डायन-बिसाही के खिलाफ लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमचंद का निधन

Meenu | February 20, 2026 | 02:12 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर,जमशेदपुर :अंधविश्वास और डायन-बिसाही जैसी कुप्रथा के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमचंद का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। वे पिछले 25 दिनों से अस्पताल में भर्ती थे और इलाज के दौरान सुबह करीब 9 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है।

संघर्षों से भरी रही जिंदगी

प्रेमचंद का जीवन किसी कहानी से कम नहीं था। उनका जन्म बिहार के सासाराम में हुआ था और उच्च शिक्षा उन्होंने बनारस से प्राप्त की। वे इमरजेंसी आंदोलन में भी सक्रिय रहे। पुलिस कार्रवाई से बचते हुए वे जमशेदपुर पहुंचे और यहीं रहकर सामाजिक और जन आंदोलनों से जुड़े। बाद में उन्होंने झारखंड आंदोलन में भी योगदान दिया।

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एक घटना ने बदल दी जिंदगी की दिशा

साल 1991 में करनडीह क्षेत्र के एक गांव में डायन-बिसाही के आरोप में पिता-पुत्र की हत्या और एक महिला को गांव से निकाल दिए जाने की घटना ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी और महिलाओं के अधिकार व सम्मान के लिए अभियान शुरू किया। उन्होंने ‘फ्री लीगल एड कमेटी’ के माध्यम से इस मुद्दे को मानवाधिकार आयोग तक पहुंचाया। शुरुआती स्तर पर निराशा हाथ लगी, लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी रखा।

कानून बनने तक जारी रहा आंदोलन

साल 1995 में कुचाई में एक परिवार के सात लोगों की हत्या की घटना के बाद उनकी मुहिम को नई गति मिली। प्रशासनिक सहयोग के साथ उनका आंदोलन निर्णायक चरण में पहुंचा और अंततः 20 अक्टूबर 1999 को बिहार विधानसभा ने ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम’ पारित किया। यह कानून अंधविश्वास के खिलाफ देश के शुरुआती सशक्त कानूनों में से एक माना जाता है। वर्तमान में यह कई राज्यों में लागू है और प्रेमचंद इसे और राज्यों में लागू कराने के लिए अंतिम समय तक सक्रिय रहे। डायन-बिसाही जैसी कुप्रथा के खिलाफ उनकी लड़ाई ने समाज में जागरूकता और कानूनी पहल को मजबूत किया। उनके निधन को सामाजिक न्याय और मानवाधिकार आंदोलन के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है।

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