- सिंदूर खेला बंगाली दुर्गा पूजा की प्रमुख परंपराओं में से एक है। विजयादशमी के दिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यह रस्म सुख-समृद्धि, सौभाग्य, प्रेम और महिला एकजुटता का प्रतीक मानी जाती है।
Samachar Post डेस्क, रांची : शारदीय दुर्गा पूजा का समापन विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई के साथ होता है। इस अवसर पर बंगाली समुदाय में कई विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं। इन्हीं में से एक है सिंदूर खेला, जो अपनी धार्मिक मान्यताओं, सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव के लिए जानी जाती है। इस रस्म में महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और खुशहाली की कामना करती हैं।
क्या है सिंदूर खेला की परंपरा?
सिंदूर खेला मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन मनाया जाता है। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक लाल और सफेद साड़ी पहनकर पूजा पंडालों में पहुंचती हैं। सबसे पहले मां दुर्गा के माथे और चरणों में सिंदूर अर्पित किया जाता है। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं देती हैं। ढाक की थाप, शंखनाद और मां दुर्गा के जयकारों के बीच निभाई जाने वाली यह रस्म उत्सव के उल्लास के साथ मां की विदाई की भावुकता को भी दर्शाती है। सिंदूर खेला बंगाली समाज की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बेटी की विदाई से जुड़ी है धार्मिक मान्यता
बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को बेटी के रूप में भी देखा जाता है, जो दुर्गा पूजा के दौरान अपने मायके आती हैं। मान्यता है कि कुछ दिनों तक मायके में रहने के बाद विजयादशमी पर मां दुर्गा अपने पति भगवान शिव के निवास कैलाश लौट जाती हैं। इसी भाव के साथ महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर विदाई देती हैं। जिस तरह परिवार में बेटी की विदाई के समय उसके सुखी जीवन की कामना की जाती है, उसी तरह इस रस्म के माध्यम से मां दुर्गा के मंगलमय जीवन की प्रार्थना की जाती है। यह मान्यता पीढ़ियों से बंगाली संस्कृति में प्रचलित है।
सिंदूर खेला का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
परंपरागत रूप से सिंदूर को सुहाग, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है। सिंदूर खेला के दौरान महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। हालांकि, इस परंपरा का महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के बीच आपसी स्नेह, अपनापन और सामाजिक जुड़ाव को भी मजबूत करती है। मां दुर्गा की विदाई के समय मनाई जाने वाली यह रस्म संदेश देती है कि त्योहार समाप्त होने के बाद भी रिश्तों की गर्माहट और सांस्कृतिक परंपराओं की अहमियत बनी रहती है।
क्या अविवाहित महिलाएं भी ले सकती हैं हिस्सा?
परंपरागत रूप से सिंदूर खेला में विवाहित महिलाएं भाग लेती रही हैं। हालांकि, कुछ स्थानों पर अब अविवाहित महिलाएं भी इस आयोजन में शामिल होती हैं। इसे महिला एकजुटता, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक उत्सव के रूप में भी देखा जा रहा है। अलग-अलग पूजा समितियों और परिवारों में इस रस्म को निभाने के तरीके भिन्न हो सकते हैं। बदलते समय के साथ कुछ आयोजनों में इसकी भागीदारी का दायरा भी व्यापक हुआ है।

मां की विदाई में खुशी और भावुकता का संगम
दुर्गा पूजा के अंतिम दिन भक्तों के मन में मां की विदाई का दुख और अगले वर्ष उनके दोबारा आगमन की उम्मीद, दोनों भाव रहते हैं। सिंदूर खेला इस भावनात्मक पल को खास बनाता है। महिलाएं मां दुर्गा को विदाई देते हुए उनके आशीर्वाद की कामना करती हैं और एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा करती हैं। यही वजह है कि सिंदूर खेला केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि प्रेम, सौभाग्य, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। बंगाल के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले बंगाली समुदायों के लिए भी इस परंपरा का विशेष महत्व है।





















