Samachar Post डेस्क, रांची : सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने दोषियों को सजा में राहत देने और समय से पहले रिहाई की प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अदालतों के माफ करने वाले रवैये के कारण अपराध बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए एक सीमा तय करने की जरूरत है। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने यह टिप्पणी गुरुवार को जस्टिस शील नागू के साथ एक मामले की सुनवाई के दौरान की। पीठ उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी की समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
बेटी की हत्या के दोषी का दिया उदाहरण
सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने एक ऐसे मामले का जिक्र किया, जिसमें एक व्यक्ति को पहले मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा उम्रकैद में बदल दी थी। उस व्यक्ति पर अपनी बड़ी बेटी के साथ दुष्कर्म कर उसकी हत्या करने का दोष साबित हुआ था। मामले में उसकी पत्नी की गवाही के आधार पर उसे सजा मिली थी। कुछ साल बाद पैरोल पर बाहर आने के दौरान उसने अपनी छोटी बेटी के सामने पत्नी की भी हत्या कर दी। छोटी बेटी की गवाही के बाद उसे इस मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी।
सजा में राहत देने की प्रवृत्ति पर जताई चिंता
जस्टिस दत्ता के अनुसार, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था कि आरोपी ने छोटी बच्ची की हत्या नहीं की थी। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने सजा कम करने के न्यायिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पहले हत्या के मामलों में ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत के आधार पर मौत की सजा तय की जाती थी, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं। जस्टिस दत्ता ने जोर दिया कि अदालतों के उदार रुख की एक सीमा होनी चाहिए, ताकि दोषियों को राहत देने की प्रवृत्ति के नकारात्मक प्रभावों पर रोक लगाई जा सके।





















