झारखंड में नक्सल नेटवर्क कमजोर, अब संगठित अपराध बड़ी चुनौती; 193 गिरफ्तार और 63 हथियार बरामद

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड में लंबे समय तक सुरक्षा बलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रहा नक्सलवाद अब पहले की तुलना में कमजोर पड़ा है। पुलिस अभियानों के चलते कई बड़े नक्सली कमांडर मारे गए, गिरफ्तार हुए या मुख्यधारा में लौटे। लेकिन नक्सली गतिविधियों के कमजोर पड़ने के साथ अपराध की दुनिया में एक नया खालीपन पैदा हुआ, जिसे संगठित आपराधिक गिरोहों ने भरने की कोशिश की है। अब अपराध का दायरा जंगलों से निकलकर शहर, जमीन, कोयला, बालू, कंस्ट्रक्शन साइट और ठेकेदारी तक फैलता दिखाई दे रहा है। ऐसे में नक्सल नेटवर्क के खिलाफ बढ़त बनाने के बाद झारखंड पुलिस के सामने संगठित अपराध पर प्रभावी अंकुश लगाना नई चुनौती बन गया है।

193 अपराधी गिरफ्तार, 63 हथियार बरामद

झारखंड पुलिस मुख्यालय के जनवरी से जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, संगठित आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान में 193 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। इस दौरान 63 हथियार और 274 गोलियां बरामद की गईं। पुलिस के मुताबिक, कार्रवाई के तहत 47 अपराधियों को जिला बदर किया गया, जबकि 9 के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया। हालांकि, लगातार सामने आ रही रंगदारी, फायरिंग और जमीन कब्जे से जुड़ी घटनाएं बताती हैं कि संगठित अपराध का नेटवर्क अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अलग-अलग आपराधिक मामलों में प्रिंस खान, राहुल दुबे, राहुल सिंह, अखिलेश सिंह, अमन साहू, सुजीत सिन्हा, डब्लू सिंह और पांडे गिरोह जैसे नाम सामने आते रहे हैं। पुलिस की चुनौती केवल इन गिरोहों से जुड़े मुख्य आरोपियों तक पहुंचने की नहीं है। गिरोह के लिए काम करने वाले लोगों, आर्थिक मदद देने वालों और लॉजिस्टिक सपोर्ट उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क को भी तोड़ना जरूरी माना जा रहा है।

गिरफ्तारी से आगे अब अपराध की आर्थिक जड़ पर वार

पुलिस रणनीति में अब बदलाव की कोशिश भी दिखाई दे रही है। केवल अपराधियों को गिरफ्तार करने के बजाय उनकी आर्थिक ताकत पर चोट करने पर जोर दिया जा रहा है। संगठित अपराध से जुड़े लोगों की चल-अचल संपत्तियों, बैंक खातों, वित्तीय लेनदेन और कारोबारी गतिविधियों की जानकारी जुटाने का काम किया जा रहा है। उद्देश्य यह पता लगाना है कि अपराध से अर्जित धन कहां निवेश किया जा रहा है और उससे नेटवर्क को किस तरह संचालित किया जा रहा है। पुलिस की ओर से अब तक करीब 150 लोगों की विस्तृत प्रोफाइल तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है। इनमें अलग-अलग आपराधिक गिरोहों से जुड़े संदिग्ध और आरोपी शामिल हैं। जांच का दायरा केवल सक्रिय अपराधियों तक सीमित नहीं है। कथित मददगारों, संरक्षण देने वालों और आर्थिक नेटवर्क से जुड़े लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है। एटीएस की टीमें भी कुछ मामलों में घरों तक जाकर भौतिक सत्यापन कर रही हैं।

आईजी अभियान नरेंद्र सिंह ने बताई पुलिस की रणनीति

आईजी अभियान नरेंद्र सिंह के अनुसार, संगठित अपराध से जुड़े लोगों के साथ-साथ उनके सहयोगियों की भी पहचान की जा रही है। आर्थिक मदद, लॉजिस्टिक सपोर्ट, हथियारों की व्यवस्था या ठिकाना उपलब्ध कराने वालों की जानकारी जुटाई जा रही है। उनके मुताबिक पुलिस एक ऑनलाइन डिजिटल डेटाबेस तैयार कर रही है, जिसमें अपराधियों के आपराधिक रिकॉर्ड के साथ उनके सहयोगियों, संपत्ति, बैंक खातों और नेटवर्क से जुड़ी जानकारियां दर्ज होंगी। पुलिस का लक्ष्य केवल एक अपराधी को गिरफ्तार करना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि उसके पीछे कौन है, पैसे का स्रोत क्या है और पूरे नेटवर्क को संचालित करने वाले लोग कौन हैं।

बड़े नामों पर कार्रवाई के बावजूद रंगदारी का खेल जारी

झारखंड में कई बड़े आपराधिक चेहरों के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है। इसके बावजूद पुलिस के सामने यह चुनौती बनी हुई है कि पुराने नेटवर्क कमजोर पड़ने के बाद नए अपराधी समूह उभर न सकें। कंस्ट्रक्शन कंपनियों, कारोबारियों और ठेकेदारों को धमकी देकर रंगदारी मांगने के मामलों में अलग-अलग गिरोहों के नाम सामने आते रहे हैं। कुछ मामलों में फायरिंग या हिंसा के जरिए डर का माहौल बनाने की कोशिश भी की गई। धनबाद और वासेपुर में प्रिंस खान गिरोह का नाम लंबे समय से रंगदारी और संगठित अपराध से जुड़े मामलों में सामने आता रहा है। पुलिस के सामने ऐसे नेटवर्क से निपटने की चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इनका प्रभाव केवल एक इलाके तक सीमित नहीं रह सकता। अपराधियों द्वारा पहले धमकी, फिर दबाव और उसके बाद रंगदारी वसूली का तरीका अपनाए जाने की बात कई मामलों में सामने आती रही है। पुलिस के लिए इन नेटवर्क के आर्थिक और स्थानीय सहयोग तंत्र तक पहुंचना अहम है।

जमीन कारोबार भी अपराधियों के निशाने पर

संगठित अपराध का एक बड़ा पहलू जमीन से जुड़े विवाद और कथित कब्जे के मामलों में भी दिखाई देता है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से जमीन विवाद में आपराधिक तत्वों की भूमिका के आरोप सामने आते रहे हैं। आरोपों के मुताबिक, कुछ मामलों में जमीन मालिकों पर दबाव बनाकर जबरन समझौता कराने या जमीन खाली कराने की कोशिश की जाती है। इसके बाद उस जमीन को ऊंची कीमत पर बेचकर आर्थिक लाभ कमाने का आरोप लगाया जाता है। पुलिस के लिए चुनौती केवल ऐसे अपराधियों की पहचान करना नहीं, बल्कि इस पूरी आर्थिक श्रृंखला को तोड़ना है।

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कोयला, बालू और पत्थर कारोबार पर भी नजर

कोयला, बालू और पत्थर जैसे क्षेत्रों से जुड़े कारोबार में रंगदारी और लेवी के आरोप भी सामने आते रहे हैं। धनबाद, रामगढ़, लातेहार, पलामू, चतरा और बोकारो जैसे क्षेत्रों में ट्रांसपोर्टरों, ठेकेदारों, आउटसोर्सिंग कंपनियों और निर्माण एजेंसियों को निशाना बनाए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। कहीं काम बंद कराने की धमकी दी जाती है तो कहीं वाहनों या निर्माण स्थलों को निशाना बनाकर दबाव बनाने की कोशिश होती है।संगठित अपराध के तौर-तरीकों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी बढ़ा है। हथियार, महंगी गाड़ियों और दबदबे से जुड़े वीडियो के जरिए अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की जाती है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह भी चुनौती है कि सोशल मीडिया पर चलने वाली ऐसी गतिविधियों की निगरानी के साथ यह पता लगाया जाए कि इनका संबंध वास्तविक आपराधिक नेटवर्क से कितना है।

असली चुनौती पूरे नेटवर्क को खत्म करने की

193 गिरफ्तारियां, 63 हथियारों की बरामदगी, 274 गोलियां, 47 जिला बदर और 9 लुकआउट नोटिस पुलिस कार्रवाई का पैमाना जरूर दिखाते हैं। लेकिन रंगदारी, फायरिंग, जमीन कब्जे और लेवी से जुड़े मामले यह संकेत देते हैं कि संगठित अपराध के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अब पुलिस के सामने असली परीक्षा यह है कि अपराधियों की गिरफ्तारी के साथ उनके फाइनेंसर, मददगार, संपत्ति और आर्थिक नेटवर्क तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंचा जाए। यदि अपराध की कमाई का रास्ता और उसके सहायक तंत्र को कमजोर किया गया, तभी गैंग आधारित अपराध पर स्थायी असर पड़ सकता है।

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