Samachar Post रिपोर्टर, रांची : हिमालयी क्षेत्र में सड़क, जलविद्युत और पर्यटन जैसी विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने से पहले वहां मौजूद प्राकृतिक खतरों का वैज्ञानिक और समग्र आकलन करना जरूरी है। नेपाल में हाल में आई अचानक बाढ़ के संदर्भ में विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी व्यवस्था को और मजबूत करने पर जोर दिया। इसी विषय पर सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड (सीयूजे), एनआईटी रायपुर और आईआईटी रुड़की की ओर से संयुक्त रूप से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय वेबिनार आयोजित किया गया। वेबिनार में नेपाल में आई बाढ़ से मिले सबक और भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई।
सिर्फ अलर्ट जारी करना पर्याप्त नहीं
विशेषज्ञों ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में केवल मौसम या आपदा का अलर्ट जारी करना पर्याप्त नहीं है। चेतावनी जारी होने के बाद सूचना को तेजी से प्रभावित लोगों तक पहुंचाना और उन्हें समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वेबिनार में इस बात पर जोर दिया गया कि स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थानों और समुदायों के बीच बेहतर समन्वय के बिना प्रभावी आपदा प्रबंधन संभव नहीं है।
बाढ़ और भूस्खलन को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता
विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में अचानक बाढ़, भूस्खलन, अत्यधिक बारिश, ग्लेशियर और हिमनदीय झीलों को एक-दूसरे से जुड़े जोखिम के रूप में देखने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि एक प्राकृतिक घटना कई अन्य आपदाओं को जन्म दे सकती है। इसलिए किसी एक खतरे पर अलग-अलग निगरानी करने के बजाय पूरे क्षेत्र के जोखिम को एक साथ समझने और उसका आकलन करने की जरूरत है।

रियल टाइम डेटा पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत
आपदा जोखिम की निगरानी के लिए विशेषज्ञों ने सैटेलाइट तस्वीरों, मौसम संबंधी सूचनाओं और जमीन पर स्थापित उपकरणों से मिलने वाले रियल टाइम डेटा को एकीकृत करने की आवश्यकता बताई। इन स्रोतों से मिलने वाली जानकारियों को एक साथ इस्तेमाल करने से संभावित खतरे की बेहतर पहचान, समय पर चेतावनी और राहत-बचाव की तैयारी को मजबूत किया जा सकता है।
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विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी
वेबिनार में इस बात पर भी जोर दिया गया कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय स्थानीय भूगोल और प्राकृतिक जोखिमों को प्राथमिकता देनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, परियोजनाओं की शुरुआत से पहले वैज्ञानिक तरीके से जोखिम का आकलन करने से भविष्य में होने वाले जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। साथ ही, आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया के लिए मजबूत चेतावनी और बचाव तंत्र तैयार करना भी जरूरी है।

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मैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।


