Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड की लोक संस्कृति और आदिवासी परंपराओं से जुड़े पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। चेन्नई स्थित Geographical Indications Registry ने मांदर को झारखंड से जुड़े विशिष्ट लोकवाद्य के रूप में GI मान्यता दी है। आवेदन में मांदर की पारंपरिक बनावट, स्थानीय कच्चे माल, निर्माण तकनीक, ध्वनि और झारखंड की सांस्कृतिक परंपराओं से इसके संबंध को प्रमुख आधार बनाया गया था।
2021 में दाखिल हुआ था GI टैग के लिए आवेदन
मांदर को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया के तहत वर्ष 2021 में आवेदन दाखिल किया गया था। इस प्रक्रिया में बौद्धिक संपदा और GI विशेषज्ञ तथा NUSRL, रांची के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने GI रजिस्ट्री के समक्ष मामले की पैरवी के साथ जरूरी ऐतिहासिक दस्तावेज और प्रमाण प्रस्तुत किए। मांदर की झारखंड से पुरानी सांस्कृतिक कड़ी साबित करने के लिए कई ऐतिहासिक और अकादमिक स्रोतों का इस्तेमाल किया गया। इनमें शरत चंद्र राय की 1915 की कृति, तारकचंद्र दास का 1931 का लेखन और W.G. Archer की 1940 की पुस्तक ‘The Blue Grove’ शामिल हैं। इसके अलावा 1920 की पटना संग्रहालय की वार्षिक रिपोर्ट, 1956 की ‘Folk Dances of India’ और रांची जिला गजेटियर के संदर्भ भी प्रस्तुत किए गए।
मांदर की विशिष्ट पहचान को मिली आधिकारिक मान्यता
GI आवेदन में मांदर की पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया, स्थानीय स्तर पर मिलने वाले कच्चे माल और इसकी विशिष्ट ध्वनि को भी आधार बनाया गया। मांदर झारखंड के लोकनृत्य, पर्व-त्योहार और सामुदायिक आयोजनों में लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है। GI टैग मिलने से इसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान को औपचारिक मान्यता मिली है। गुमला के जर्जटा गांव में मांदर निर्माण की पारंपरिक गतिविधियों को भी इस पूरी प्रक्रिया से जोड़ा गया है। क्षेत्र के कारीगर पीढ़ियों से इस वाद्य यंत्र के निर्माण से जुड़े रहे हैं।
GI मान्यता से कारीगरों को नए अवसर की उम्मीद
मांदर को GI टैग मिलने के बाद इसके पारंपरिक निर्माताओं और कारीगरों को अपने उत्पाद की विशिष्ट पहचान के साथ नए बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। GI दर्जा किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति और उससे जुड़ी विशिष्ट विशेषताओं की पहचान को कानूनी संरक्षण देता है। इस उपलब्धि को झारखंड की लोक और आदिवासी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। GI मान्यता से मांदर की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होने की संभावना है।
GI प्रक्रिया में डॉ. सत्यदीप सिंह की भूमिका
मांदर के GI पंजीकरण की प्रक्रिया में डॉ. सत्यदीप सिंह ने आवेदन से लेकर रजिस्ट्री के समक्ष प्रस्तुतिकरण तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे इससे पहले सोहराय-खोवर चित्रकला और कोडरमा के केसरिया कलाकंद को GI मान्यता दिलाने की प्रक्रिया से भी जुड़े रहे हैं।























