Samachar Post रिपोर्टर, सरायकेला-खरसावां : झारखंड गठन के करीब 26 साल बाद भी सरायकेला-खरसावां जिले के चार गांवों के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चांडिल अनुमंडल के नीमडीह प्रखंड की बाड़ेदा पंचायत के सीमावर्ती शियालगोड़ा, काशीडीह, रापकाड़ा और भूषणडीह टोला में करीब 200 आदिवासी परिवार रहते हैं। पुरुलिया और जमशेदपुर जिले की सीमा से सटे इन गांवों को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली सांसागडीह से शियालगोड़ा तक करीब 3 किलोमीटर सड़क लंबे समय से कच्ची है। बारिश के दिनों में सड़क की हालत और खराब हो जाती है, जिससे ग्रामीणों का आवागमन मुश्किल हो जाता है। हालात से परेशान ग्रामीणों ने अब खुद सड़क को चलने लायक बनाने का काम शुरू किया है।
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सरकारी इंतजार खत्म, ग्रामीणों ने खुद संभाली सड़क की जिम्मेदारी
लंबे समय से सड़क निर्माण की मांग के बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने पर ग्रामीणों ने श्रमदान शुरू कर दिया। ग्रामीण कुदाल और गैंता लेकर सड़क को दुरुस्त करने में जुट गए। ट्रैक्टर से मुरुम मंगाकर सड़क पर डाला गया, ताकि बारिश के दौरान भी किसी तरह आवागमन जारी रह सके। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकारी व्यवस्था उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकी तो मजबूरी में उन्हें खुद सड़क बनाने के लिए आगे आना पड़ा।
सड़क खराब होने से एंबुलेंस तक नहीं पहुंच पाती
ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी परेशानी स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर है। बाड़ेदा स्वास्थ्य केंद्र गांव से करीब 3 से 4 किलोमीटर दूर है, लेकिन खराब और कीचड़ भरे रास्ते के कारण जरूरत पड़ने पर एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती। ग्रामीणों के मुताबिक, गंभीर मरीजों को कई बार कंधे पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सहिया शांतिमय मार्डी ने बताया कि एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंचने के कारण कई बार महिलाओं को घर पर ही प्रसव कराने की स्थिति बन जाती है।
बिजली, पानी और शिक्षा की भी समस्या
ग्रामीणों का कहना है कि इलाके में संथाल, भूमिज और मुंडा समुदाय के परिवार रहते हैं। अधिकांश लोग कृषि और दलमा जंगल पर निर्भर हैं। उनका आरोप है कि सड़क के साथ-साथ नियमित बिजली, शुद्ध पेयजल, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का भी अभाव है। खराब सड़क के कारण बच्चों को स्कूल आने-जाने में भी परेशानी होती है। बरसात के दौरान जंगली हाथी, भालू, सांप और बिच्छू का खतरा भी ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त चिंता का कारण बना रहता है।

‘मरीजों को कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता है’
ग्रामीण राजू सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज ने देश की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन आज भी उनके गांवों के लोगों को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सड़क नहीं होने के कारण मरीजों को कई किलोमीटर तक कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता है। वहीं, खराब रास्ते का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है। सहिया शांतिमय मार्डी ने कहा कि ग्रामीणों की समस्या को लेकर लगातार आवाज उठाई गई, लेकिन सड़क का स्थायी समाधान नहीं हुआ।
शिलान्यास हुआ, लेकिन सड़क निर्माण आगे नहीं बढ़ा
ग्रामीणों का दावा है कि सांसागडीह से शियालगोड़ा तक करीब 3 किलोमीटर सड़क निर्माण का शिलान्यास पूर्व विधायक साधु महतो के कार्यकाल में हुआ था। हालांकि, शिलान्यास के बाद निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ सका। ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को सड़क की समस्या से अवगत कराया, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं हुआ।
ग्रामीणों की मांग- अब आश्वासन नहीं, जमीन पर काम चाहिए
ग्रामीणों ने प्रशासन से क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण कराने और सड़क के साथ-साथ पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य व शिक्षा की समस्याओं का समाधान करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि धरातल पर काम चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो आगामी चुनाव के दौरान गांवों में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के प्रवेश का विरोध किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा कि वोट मांगने आने वाले नेताओं से भी इन समस्याओं को लेकर सवाल किया जाएगा।

Reporter | Samachar Post


