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कोडरमा-गिरिडीह में ढिबरा चुनाई पर रोक से बढ़ा संकट, हजारों मजदूरों की आजीविका पर असर

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Samachar Post रिपोर्टर,कोडरमा : झारखंड के कोडरमा और गिरिडीह जिले में ढिबरा (अभ्रक के छोटे टुकड़े) चुनाई पर लगी रोक के बाद हजारों मजदूरों और अभ्रक कारोबार से जुड़े परिवारों के सामने आजीविका का संकट गहराने लगा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बंद पड़ी अभ्रक खदानों के मलबे से ढिबरा चुनकर ही हजारों परिवार वर्षों से अपना जीवनयापन कर रहे हैं।

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करीब 3 लाख लोगों की आजीविका जुड़ी होने का दावा

स्थानीय प्रतिनिधियों और व्यापारियों के अनुसार, वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के बाद कई अभ्रक खदानें बंद हो गई थीं। इसके बाद खदानों के मलबे से ढिबरा चुनना ही लोगों की आय का प्रमुख स्रोत बन गया। उनका दावा है कि कोडरमा और गिरिडीह के एक हजार से अधिक गांवों के करीब 3 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस कार्य पर निर्भर हैं।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, बिहार माइका एक्ट, 1947 की धारा 3 के तहत छह वर्ग इंच तक के अभ्रक के छोटे टुकड़ों पर प्रतिबंध नहीं था। इसी आधार पर वर्षों तक ढिबरा चुनाई और उसका व्यापार चलता रहा। वर्ष 2015 में तत्कालीन रघुवर दास सरकार के दौरान ढिबरा डंपों की नीलामी की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन यह व्यवस्था अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। इसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई तेज हो गई। वर्ष 2019 में हेमंत सोरेन सरकार ने लघु खनिज नियमावली में संशोधन कर ढिबरा कारोबार को वैध रूप दिया। इसके तहत मजदूरों की सहकारी समितियों (को-ऑपरेटिव सोसाइटी) को ढिबरा चुनने का अधिकार दिया गया, जबकि नीलामी की जिम्मेदारी झारखंड स्टेट मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (JSMDC) को सौंपी गई। इसके बाद 17 जनवरी 2023 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ढिबरा परिवहन की औपचारिक शुरुआत भी की थी।

रोक को लेकर उठ रहे सवाल

स्थानीय व्यापारियों और मजदूर संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा क्षेत्र में लिथियम की संभावनाओं का हवाला देते हुए ढिबरा कार्य पर रोक लगाई गई है। उनका कहना है कि एक वर्ष पहले नमूने जांच के लिए भेजे गए थे, लेकिन अब तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। इसी मुद्दे को लेकर स्थानीय प्रतिनिधिमंडल ने कोडरमा की सांसद एवं केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी से भी मुलाकात की, हालांकि फिलहाल कोई समाधान सामने नहीं आया है।

कॉर्पोरेट कब्जे के आरोप, सरकार की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं

इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कुछ स्थानीय नेताओं ने आरोप लगाया है कि लिथियम की संभावनाओं के नाम पर बड़े कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही संबंधित सरकारी एजेंसियों ने इस संबंध में कोई सार्वजनिक पुष्टि की है। पूर्व इंडिया गठबंधन प्रत्याशी विनोद कुमार सिंह ने अभ्रक उद्योग और ढिबरा से जुड़े मजदूरों के हितों की रक्षा की मांग की है। वहीं, भाजपा पर भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधने का आरोप लगाया गया है। अब सभी की नजर राज्य सरकार और केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी है कि ढिबरा कारोबार से जुड़े इस गतिरोध का समाधान कब तक निकलता है।

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Meenu

Reporter  |  Samachar Post

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