बाबूलाल मरांडी बोले- वर्दी अगर पहचान को गाली बनाए, तो न्याय की उम्मीद कहां करें

Meenu | August 27, 2026 | 02:57 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर,रांची : झारखंड में पुलिसकर्मियों द्वारा आदिवासियों के कथित अपमान और वायरल हो रहे वीडियो को लेकर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने पुलिस एसोसिएशन की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई पुलिस व्यवस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि पुलिस पर जनता के भरोसे और उसकी गरिमा को बचाने की लड़ाई है। मरांडी ने कहा कि वे खुद आदिवासी समाज से आते हैं और उनके लिए ‘आदिवासी’ शब्द केवल पहचान नहीं, बल्कि पुरखों का इतिहास, संस्कृति, संघर्ष और स्वाभिमान है।

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‘एक व्यक्ति नहीं, पूरे समाज की भावना आहत होती है’

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि जब कोई पुलिसकर्मी आदिवासी पहचान को कथित तौर पर गाली की तरह इस्तेमाल करता है या किसी आदिवासी का सार्वजनिक रूप से अपमान करता है, तो चोट केवल उस व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समाज को पहुंचती है। उन्होंने कहा कि आम जनता पुलिस को अपना विरोधी नहीं मानती। अन्याय होने पर सबसे पहले वर्दी से ही सुरक्षा और न्याय की उम्मीद की जाती है। ऐसे में अगर रक्षक ही कथित तौर पर अपमान करने लगे, तो पीड़ित अपनी शिकायत लेकर कहां जाएगा।

पुलिस एसोसिएशन की चुप्पी पर उठाए सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने आधा दर्जन से अधिक वायरल वीडियो का हवाला देते हुए पुलिस एसोसिएशन से कई सवाल पूछे। उन्होंने जानना चाहा कि क्या एसोसिएशन ने अपने स्तर पर किसी दोषी सदस्य के खिलाफ कार्रवाई की है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कोई निंदा प्रस्ताव पारित किया गया या फिर कठोर कानूनी कार्रवाई के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखा गया। मरांडी ने कहा कि अगर ऐसा किया गया है तो उसके प्रमाण भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

‘सदस्यों के अधिकार के साथ गलत लोगों के खिलाफ भी खड़ा होना होगा’

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि अपने सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करना किसी भी एसोसिएशन का दायित्व है, लेकिन संगठन की वास्तविक नैतिकता की परीक्षा तब होती है, जब उसे अपने ही सदस्यों के बीच गलत काम करने वालों के खिलाफ खड़ा होना पड़े उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में संस्था की चुप्पी से पीड़ित आदिवासी समाज के बीच यह संदेश जाता है कि उनकी गरिमा और पीड़ा का कोई महत्व नहीं है।

‘आदिवासी पहचान को गाली न बनाया जाए’

मरांडी ने कहा कि आदिवासी समाज की मांग स्पष्ट है कि उनकी पहचान को अपमान का माध्यम न बनाया जाए। वर्दी की आड़ में किसी व्यक्ति या समुदाय की गरिमा को ठेस पहुंचाने वालों को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि पुलिस और जनता के बीच विश्वास का रिश्ता तभी मजबूत रह सकता है, जब कानून लागू करने वाली संस्था खुद निष्पक्षता, सम्मान और जवाबदेही के मानकों पर कायम रहे।

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