JPSC-JSSC में सुधार के लिए कानून की मांग, AJSU नेता संजय मेहता ने CM हेमंत को लिखा पत्र

Rupa Kumari | August 20, 2026 | 01:31 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड में JPSC-JSSC समेत प्रतियोगी परीक्षाओं और नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की मांग तेज हो गई है। आजसू पार्टी के महासचिव और हजारीबाग लोकसभा के पूर्व प्रत्याशी संजय मेहता ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर परीक्षा, शिक्षा, छात्रवृत्ति और नियुक्ति व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए नया कानून बनाने की मांग की है। संजय मेहता ने प्रस्तावित कानून का नाम ‘झारखंड शिक्षा, परीक्षा, छात्रवृत्ति एवं पारदर्शी नियुक्ति (पारदर्शिता, जवाबदेही एवं संस्थागत सुधार) विधेयक, 2026’ रखने का सुझाव दिया है।

सिर्फ आयोग में बदलाव से नहीं होगा समाधान

संजय मेहता ने कहा कि JPSC और JSSC समेत राज्य की प्रतियोगी परीक्षाएं पिछले कई वर्षों से विवाद, अनियमितता, पेपर लीक, देरी और बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता जैसी समस्याओं से प्रभावित रही हैं। इससे युवाओं और अभ्यर्थियों के बीच परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि केवल आयोग के अध्यक्ष या सदस्यों को बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। इसके लिए कानूनी और संस्थागत सुधार जरूरी हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि SOP महज एक मार्गदर्शिका है, इसलिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए बाध्यकारी कानून बनाया जाना चाहिए।

स्वतंत्र परीक्षा एजेंसी बनाने का प्रस्ताव

संजय मेहता के प्रस्ताव में झारखंड राज्य परीक्षा एजेंसी (JSTA) के गठन की बात कही गई है। यह एजेंसी राज्य की प्रतियोगी और नियुक्ति परीक्षाओं के आयोजन, प्रश्नपत्र प्रबंधन, परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था, डिजिटल सुरक्षा और डेटा विश्लेषण का काम संभालेगी। प्रस्ताव के अनुसार, JPSC जैसे आयोग को उसकी संवैधानिक भूमिका यानी चयन सूची की अनुशंसा तक सीमित रखा जा सकता है। इससे परीक्षा संचालन और चयन प्रक्रिया में जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा होने की उम्मीद है।

पेपर लीक और परीक्षा अपराधों पर सख्त प्रावधान

मसौदे में CID के अंतर्गत विशेष परीक्षा अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ बनाने का सुझाव दिया गया है। पेपर लीक, संगठित नकल, डमी अभ्यर्थी, साइबर हैकिंग, परीक्षा माफिया और परिणाम में हेराफेरी जैसे मामलों के लिए विशेष अदालत और विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने का प्रस्ताव है। ऐसे मामलों का निपटारा 3 से 6 महीने के भीतर करने का लक्ष्य रखने और दोषियों की संपत्ति कुर्क या जब्त करने जैसे प्रावधान शामिल करने की मांग की गई है।

परीक्षा कैलेंडर और समय-सीमा तय करने की मांग

प्रस्तावित कानून में प्रत्येक वर्ष 31 दिसंबर तक अगले साल का परीक्षा कैलेंडर जारी करने की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है। विज्ञापन जारी होने से नियुक्ति तक की प्रक्रिया सामान्यतः 12 महीने के भीतर पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। मसौदे में आवेदन प्रक्रिया समाप्त होने के 60 से 90 दिनों के भीतर प्रारंभिक परीक्षा और परीक्षा के 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक परिणाम जारी करने जैसी समय-सीमा तय करने की बात कही गई है। निर्धारित समय का पालन नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान रखने का सुझाव भी दिया गया है।

डिजिटल सुरक्षा और पारदर्शिता पर जोर

परीक्षा प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, QR कोड, जियो-फेंसिंग, CBT, बायोमेट्रिक और फेस ऑथेंटिकेशन जैसे उपाय लागू करने का प्रस्ताव है। AI आधारित निगरानी, लाइव मॉनिटरिंग और सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल रूम बनाने की बात भी कही गई है। मसौदे में प्रश्नपत्र निर्माण का काम निजी बाहरी एजेंसियों को नहीं सौंपने का सुझाव दिया गया है। संजय मेहता ने परीक्षा के बाद की प्रक्रिया को भी पारदर्शी बनाने की मांग की है। प्रस्ताव के अनुसार, परीक्षा समाप्त होने के 72 घंटे के भीतर प्रारंभिक उत्तर कुंजी जारी की जानी चाहिए। इसके बाद अंतिम उत्तर कुंजी, अभ्यर्थियों के अंक, कटऑफ, श्रेणीवार कटऑफ और चयन सूची सार्वजनिक करने का प्रावधान होना चाहिए।

विश्वविद्यालय और छात्रवृत्ति व्यवस्था में भी सुधार

प्रस्तावित विधेयक में विश्वविद्यालयों के लिए निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर लागू करने और सत्र, परीक्षा व परिणाम के लिए समय-सीमा तय करने की मांग की गई है। पात्रता पूरी होने के अधिकतम 180 दिनों के भीतर डिग्री जारी करने का सुझाव भी दिया गया है। छात्रवृत्ति के लिए केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल को मजबूत करने तथा आवेदन के 30 से 45 दिनों के भीतर आधार आधारित DBT के माध्यम से राशि सीधे छात्रों के बैंक खाते में भेजने का प्रस्ताव है।

यह भी पढ़ें : जमशेदपुर में DJ बंद कराने पहुंची पुलिस पर पथराव, वाहन में तोड़फोड़; ASI घायल

स्वतंत्र निरीक्षण समिति बनाने की मांग

मसौदे में परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया की निगरानी के लिए स्वतंत्र उच्चस्तरीय निरीक्षण समिति गठित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश, पूर्व UPSC या राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, शिक्षा विशेषज्ञ और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही गई है। प्रस्ताव में अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के साथ अभ्यर्थियों के हितों की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। इसके तहत अभ्यर्थी सुविधा सेल, शिकायत निवारण पोर्टल, परीक्षा रद्द होने की स्थिति में मुआवजा और आयु सीमा में छूट जैसे प्रावधान सुझाए गए हैं।

विशेषज्ञों की राय लेकर विधानसभा में विधेयक लाने की मांग

संजय मेहता ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि उनके प्रस्ताव पर विशेषज्ञों से कानूनी राय लेकर इसे और व्यापक बनाया जाए। इसके बाद विधेयक को कैबिनेट में रखने और विधानसभा से पारित कराने की दिशा में पहल की जाए। उन्होंने कहा कि परीक्षा और नियुक्ति व्यवस्था में स्थायी सुधार से झारखंड के युवाओं को पारदर्शी, समयबद्ध और भरोसेमंद व्यवस्था मिल सकेगी।

Share this news

संबंधित खबरें