Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने दुमका के एक भूमि विवाद मामले में अहम निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि खतियान (रिकॉर्ड ऑफ राइट्स) के अंतिम प्रकाशन के बाद निर्धारित समय सीमा समाप्त होने पर उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। अदालत ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए संबंधित वाद को खारिज कर दिया।
छह महीने के भीतर ही आपत्ति जरूरी
जस्टिस एस.के. द्विवेदी की अदालत ने कहा कि संथाल परगना सेटलमेंट रेगुलेशन 1872 के तहत खतियान प्रकाशित होने के छह महीने के भीतर ही आपत्ति दर्ज करनी होती है। इसके बाद खतियान अंतिम रूप ले लेता है और बिना नई बंदोबस्ती या राज्य सरकार की अनुमति के इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
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क्या था मामला
यह विवाद दुमका जिले के बारा करैला और गजांदा गांव की जमीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता केदार बैद की माता के नाम पर वर्ष 1998 में खतियान प्रकाशित हुआ था। इसके बावजूद प्रतिवादी पक्ष ने वर्ष 2006 में जमीन पर अधिकार को लेकर मुकदमा दायर किया। हाईकोर्ट ने पाया कि प्रतिवादियों ने तय छह महीने की अवधि में न तो आपत्ति दर्ज की और न ही खतियान को चुनौती दी। ऐसे में 2006 में दायर किया गया मुकदमा समय सीमा से बाहर माना गया।
निचली अदालत के आदेश पर सवाल
अदालत ने कहा कि दुमका की निचली अदालत द्वारा वाद को खारिज न करना उचित नहीं था। इसलिए 12 मई 2010 के आदेश को रद्द कर दिया गया। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए टाइटल सूट को पूरी तरह खारिज कर दिया और स्पष्ट संदेश दिया कि भूमि विवाद मामलों में समय सीमा का पालन अनिवार्य है।
फैसले का असर
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि खतियान से जुड़े मामलों में देरी से उठाई गई आपत्तियों को कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी।
इससे भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्टता और अनुशासन बढ़ने की उम्मीद है।
Reporter | Samachar Post
मैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।