Samachar Post रिपोर्टर, रांची :झारखंड में ‘डायन प्रथा’ जैसी कुप्रथा को खत्म करने को लेकर न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया है। रांची स्थित झारखंड न्यायिक अकादमी में आयोजित एक महत्वपूर्ण कोलोकीयम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने इस सामाजिक बुराई पर गहरी चिंता जताई और पीड़ितों के पुनर्वास को प्राथमिकता देने की बात कही।
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संवैधानिक अधिकार और जमीनी हकीकत में अंतर
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 महिलाओं को समानता और गरिमा का अधिकार देते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव पूरी तरह नहीं दिखता। उन्होंने डायन प्रथा को अंधविश्वास के साथ-साथ सामाजिक असमानता और पितृसत्ता से जुड़ी गंभीर समस्या बताया।
सिर्फ सजा नहीं, पुनर्वास भी जरूरी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि पीड़ितों का पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाना भी है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता को इस समस्या के समाधान की कुंजी बताया।
कानून नहीं, क्रियान्वयन है चुनौती
कार्यक्रम में मौजूद न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने में सबसे बड़ी चुनौती कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। उन्होंने जिला स्तर पर कानूनी संस्थाओं को अधिक सक्रिय बनाने और लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
गांव-गांव तक पहुंचे कानूनी सहायता
कोलोकीयम में यह भी निर्णय लिया गया कि कानूनी सहायता संस्थाओं को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाया जाएगा, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय, मुआवजा और सुरक्षा मिल सके। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़ी महिलाओं और जरूरतमंद परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान की गई। इसमें गंभीर बीमारियों और दुर्घटनाओं से प्रभावित परिवार भी शामिल रहे। कार्यक्रम में महेश शरदचंद्र सोनक समेत कई न्यायाधीश और अधिकारी मौजूद रहे। सरकार की ओर से भी यह आश्वासन दिया गया कि इन सुझावों को जमीनी स्तर पर लागू किया जाएगा।
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