ट्राइबल सब प्लान की राशि के विचलन पर लगेगी रोक, कानून बनाने की तैयारी में सरकार

Rupa Kumari | February 26, 2026 | 12:42 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में ट्राइबल सब प्लान (TSP) की राशि के विचलन का मुद्दा जोरदार तरीके से उठा। विधायक राजेश कश्यप के अल्पसूचित सवाल के जवाब में मंत्री चमरा लिंडा ने स्वीकार किया कि टीएसपी फंड का विचलन हो रहा है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि कल्याण विभाग को मिलने वाली राशि का विचलन नहीं होता, क्योंकि वह केंद्र सरकार से शर्तों के साथ प्राप्त होती है। लेकिन अन्य विभागों को मिलने वाली टीएसपी मद की राशि का उपयोग कई बार निर्धारित उद्देश्य से हटकर किया गया है।

कानून के अभाव में हो रही गड़बड़ी

चमरा लिंडा ने कहा कि राज्य में टीएसपी फंड के उपयोग को लेकर सख्त कानून नहीं होने के कारण यह स्थिति बनी है। उन्होंने बताया कि सरकार आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश सहित अन्य राज्यों में बने कानूनों का अध्ययन कर रही है, ताकि झारखंड में भी आदिवासी हितों की रक्षा के लिए ठोस कानूनी प्रावधान लागू किया जा सके। उन्होंने विधायक राजेश कच्छप से भी आग्रह किया कि वे अन्य राज्यों में लागू कानूनों के अध्ययन में साथ चलें।

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26 विभागों को मिलती है राशि

जानकारी के अनुसार, ट्राइबल सब प्लान की राशि जनजातीय क्षेत्रों के विकास पर खर्च किए जाने का प्रावधान है। लेकिन वर्तमान में 26 अन्य विभागों को मिलने वाली इस मद की राशि का उपयोग कई बार अन्य कार्यों में कर दिया जाता है। मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि पूर्व में टीएसपी फंड का उपयोग ऐसे मदों में भी हुआ, जो सीधे तौर पर जनजातीय विकास से संबंधित नहीं थे।

26% राशि आरक्षित करने की मांग

विधायक राजेश कच्छप ने सरकार से मांग की कि ट्राइबल सब प्लान के लिए कुल बजट का कम से कम 26% हिस्सा सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि राज्य की जनजातीय आबादी लगभग 26 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि यदि आबादी के अनुपात में बजट सुनिश्चित किया जाएगा और उसके उपयोग पर कानूनी निगरानी होगी, तभी वास्तविक विकास संभव है।

सरकार का रुख स्पष्ट

सरकार ने संकेत दिया है कि टीएसपी राशि के विचलन को रोकने के लिए विधायी पहल की जाएगी। यदि कानून बनता है तो भविष्य में ट्राइबल सब प्लान की राशि को केवल जनजातीय क्षेत्रों और उनके विकास कार्यक्रमों पर ही खर्च करना अनिवार्य होगा। बजट सत्र में उठे इस मुद्दे ने आदिवासी विकास और वित्तीय पारदर्शिता पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

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