झारखंड विश्वविद्यालयों में सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्स पर नई व्यवस्था, 3 साल कम एडमिशन तो हो सकता है बंद

Rupa Kumari | August 31, 2026 | 03:11 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड के राज्य विश्वविद्यालयों में संचालित सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों के लिए सरकार ने नई व्यवस्था लागू की है। अब ऐसे कोर्स अपनी आर्थिक स्थिति, छात्र संख्या, गुणवत्ता और रोजगार की उपयोगिता के आधार पर संचालित किए जाएंगे। इन पाठ्यक्रमों का खर्च सरकार नहीं उठाएगी। शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन के साथ लैब, उपकरण और अन्य शैक्षणिक खर्च की व्यवस्था विद्यार्थियों की फीस तथा अन्य गैर-सरकारी स्रोतों से करनी होगी। नई व्यवस्था के तहत किसी पाठ्यक्रम में लगातार तीन वर्षों तक छात्रों की संख्या कम रहने, लगातार घाटे में चलने या रोजगार के लिहाज से उपयोगिता कम होने पर उसे बंद किया जा सकता है।

हर पांच साल में होगी कोर्स की समीक्षा

सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों को अधिकतम पांच साल की मंजूरी दी जाएगी। अवधि पूरी होने के बाद कोर्स को जारी रखने के लिए दोबारा अनुमति लेनी होगी। समीक्षा के दौरान छात्र संख्या, वित्तीय स्थिति, पाठ्यक्रम की गुणवत्ता और रोजगार बाजार में उसकी मांग समेत कई पहलुओं को देखा जाएगा। इसके लिए विश्वविद्यालय स्तर पर नीड असेसमेंट एंड मॉनिटरिंग कमिटी बनाई जाएगी। प्रत्येक पाठ्यक्रम की निगरानी के लिए सेंटर स्टीयरिंग कमिटी का भी प्रावधान किया गया है।

कॉमन पोर्टल से होगा दाखिला

सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों में प्रवेश चांसलर पोर्टल या सरकार द्वारा निर्धारित कॉमन एडमिशन पोर्टल के माध्यम से होगा। दाखिले में झारखंड की आरक्षण नीति लागू रहेगी। चार वर्षीय UG, एक और दो वर्षीय PG तथा डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों को कई मामलों में नियमित छात्रों के समान सुविधाएं मिलेंगी। वे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकेंगे और चुनाव में मतदान का अधिकार भी होगा। शिकायत निवारण और एंटी-रैगिंग से संबंधित नियम भी इन विद्यार्थियों पर लागू होंगे।

फैकल्टी नियुक्ति में आरक्षण नीति लागू नहीं होगी

नई व्यवस्था के तहत सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों में फुल टाइम और पार्ट टाइम शिक्षकों की नियुक्ति की जा सकेगी। फुल टाइम फैकल्टी में 40 प्रतिशत टेन्योर ट्रैक, 10 प्रतिशत प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस और 50 प्रतिशत एडजंक्ट फैकल्टी का प्रावधान किया गया है। टेन्योर ट्रैक फैकल्टी की शुरुआती नियुक्ति पांच साल के लिए होगी। वहीं इन पाठ्यक्रमों में शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति या अनुबंध में राज्य सरकार की आरक्षण नीति लागू नहीं होगी। अनुबंध समाप्त होने के बाद कर्मचारी स्थायी नियुक्ति का दावा भी नहीं कर सकेंगे।

पुराने पाठ्यक्रमों को मिलेगा एक साल का समय

पहले से संचालित सेल्फ-फाइनेंस्ड पाठ्यक्रमों को नई व्यवस्था के अनुरूप लाने के लिए विश्वविद्यालयों को एक वर्ष का ट्रांजिशन पीरियड दिया गया है। इस दौरान विश्वविद्यालयों को जरूरी मंजूरी और निर्धारित प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं करने वाले पाठ्यक्रमों को बिना मान्यता वाला माना जा सकता है और ऐसे पाठ्यक्रमों को रद्द किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में उनके आधार पर विद्यार्थियों को डिग्री जारी नहीं की जा सकेगी।

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अब प्रदर्शन के आधार पर तय होगी पाठ्यक्रमों की निरंतरता

नई व्यवस्था से विश्वविद्यालयों के सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्स पर आर्थिक और अकादमिक प्रदर्शन का दबाव बढ़ेगा। छात्र संख्या, गुणवत्ता, खर्च और रोजगार की उपयोगिता जैसे मानकों पर नियमित समीक्षा के बाद ही किसी पाठ्यक्रम को आगे जारी रखने की अनुमति मिलेगी।

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