निकाय चुनाव: गांव में साफ, शहर में भी आधी रह गई भाजपा

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में करारी हार झेल चुकी भाजपा को अब शहरी निकाय चुनाव में भी झटका लगा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है गांव में पहले ही साफ हुई पार्टी, शहर में भी ‘हाफ’ रह गई।

लोकसभा-विधानसभा से शुरू हुई गिरावट

2024 के लोकसभा चुनाव में झारखंड की अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित सभी पांच सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। विधानसभा चुनाव में भी 28 सुरक्षित सीटों में से 27 पर पार्टी पराजित रही। सिर्फ सरायकेला से चंपाई सोरेन जीत दर्ज कर सके। इससे साफ संकेत मिला कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा का जनाधार कमजोर हुआ है।

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निकाय चुनाव में भी झटका

अब तक घोषित आठ नगर निगमों में भाजपा महज तीन सीटों पर सिमट गई है। पिछली बार जहां लगभग 90% मेयर और अध्यक्ष पदों पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी जीते थे, इस बार 48 निकायों में सिर्फ 18-20 सीटों पर ही जीत मिली। धनबाद नगर निगम में मतगणना जारी है, लेकिन वहां भी पार्टी की स्थिति कमजोर बताई जा रही है। दूसरी ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने गिरिडीह और देवघर नगर निगम जीतकर यह संकेत दिया है कि वह भाजपा के पारंपरिक शहरी गढ़ में भी सेंध लगाने लगा है। अगर यह रुझान जारी रहा तो आने वाले चुनावों में भाजपा की चुनौती और बढ़ सकती है।

कांग्रेस को भी सीमित लाभ

कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव पूरी तरह उत्साहजनक नहीं रहा। मानगो में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार की जीत को स्थानीय प्रभाव अधिक माना जा रहा है। वहीं जमशेदपुर पश्चिम से विधायक सरयू राय की मौजूदगी ने भी समीकरण प्रभावित किए। जुगसलाई में भाजपा समर्थित प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा।

बागियों ने बिगाड़ा खेल

मेयर पद के चुनाव में बागियों ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। हजारीबाग में विजयी अरविंद राणा भाजपा के बागी थे, जबकि दूसरे स्थान पर रहे सरफराज अहमद झामुमो से जुड़े रहे हैं। धनबाद में भी संकेत हैं कि जीत किसी बागी के खाते में जा सकती है। कई जगहों पर बागियों ने अधिकृत प्रत्याशियों को नुकसान पहुंचाया।

नेताओं के कद पर असर

निकाय चुनाव ने कई नेताओं के राजनीतिक कद को प्रभावित किया। देवघर में भाजपा की हार को सांसद निशिकांत दुबे के प्रभाव में कमी के रूप में देखा जा रहा है। हजारीबाग में भी पार्टी को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। वहीं कांग्रेस के बन्ना गुप्ता और झामुमो के सुदिव्य कुमार सोनू जैसे नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव दिखाया।

‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ की रणनीति?

दिलचस्प बात यह रही कि कुछ स्थानों पर बागी उम्मीदवारों की जीत के बाद भाजपा ने उन्हें बधाई देकर अपने साथ जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी। पाकुड़ में महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष सबरी पॉल पहले कारण बताओ नोटिस झेल रही थीं, लेकिन जीत के तुरंत बाद उन्हें बधाई दी गई। भाजपा का तर्क है कि गुमला, लोहरदगा और खूंटी जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मिली जीत जनाधार बढ़ने का संकेत है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का सवाल है कि यदि बड़े शहरी निकाय हाथ से निकल रहे हों, तो क्या सीमित जीत को विस्तार माना जा सकता है? फिलहाल निकाय चुनाव के नतीजे यह संकेत दे रहे हैं कि झारखंड की राजनीति में शहरी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और आने वाले चुनावों में सभी दलों को नई रणनीति के साथ मैदान में उतरना होगा।

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