पाकुड़ के तत्कालीन एसपी अमरजीत बलिहार हत्याकांड: हाई कोर्ट में तीसरे जज ने पूरी की सुनवाई, आदेश सुरक्षित

Rupa Kumari | November 11, 2025 | 03:16 PM IST

Samachar Post रिपोर्टर,पाकुड़ : पाकुड़ के तत्कालीन एसपी अमरजीत बलिहार और पांच अन्य पुलिसकर्मियों की हत्या मामले में दो नक्सलियों को सुनाई गई फांसी की सजा के खिलाफ दायर अपील पर मंगलवार को हाई कोर्ट में तीसरे जज के समक्ष सुनवाई पूरी हो गई। जस्टिस गौतम कुमार चौधरी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।

खंडपीठ के दो जजों के विपरीत आदेश के कारण तीसरे जज को सुनवाई सौंपी गई

इस मामले में पहले हाई कोर्ट की खंडपीठ के दो जजों ने अलग-अलग आदेश दिए थे। जस्टिस संजय प्रसाद ने दुमका कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार रखा था, जबकि जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय ने दोनों दोषियों, सुखलाल उर्फ प्रवीर मुर्मू और सनातन बास्की उर्फ ताला दा को बरी कर दिया था। दोनों आदेश पर असहमति होने के बाद मामला तीसरे जज के पास भेजा गया। जस्टिस गौतम कुमार चौधरी का फैसला खंडपीठ के किस जज के आदेश से मेल खाएगा, इसी आधार पर बहुमत का निर्णय प्रभावी माना जाएगा। सुखलाल मुर्मू की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र शंकर सिंह ने अपील पर पक्ष रखा। दोषियों ने दुमका कोर्ट के निर्णय को चुनौती देते हुए कहा था कि सजा पुख्ता सबूतों के आधार पर नहीं है और उन्हें रिहा किया जाए।

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जस्टिस संजय प्रसाद का आदेश- फांसी की सजा बरकरार

जस्टिस संजय प्रसाद ने अपने फैसले में निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा को बरकरार रखते हुए शहीद एसपी अमरजीत बलिहार के परिवार को 2 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। साथ ही एसपी बलिहार के पुत्र या पुत्री को डिप्टी एसपी/डिप्टी कलेक्टर पद पर नियुक्त करने और उम्र सीमा में छूट देने का निर्देश दिया। उन्होंने अन्य 5 शहीद पुलिसकर्मियों के परिजनों को 50-50 लाख रुपये मुआवजा और योग्यतानुसार पुलिस विभाग के फोर्थ ग्रेड या सिविल सेवाओं में नौकरी देने का आदेश भी दिया था।

घटना 2013 की

यह मामला वर्ष 2013 का है। चुनावी मीटिंग में शामिल होने के बाद लौटते समय नक्सलियों ने एसपी अमरजीत बलिहार के काफिले पर हमला कर दिया था। हमले में एसपी सहित छह पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी।

दुमका कोर्ट ने सुनाई थी फांसी की सजा

दुमका के विशेष न्यायाधीश तौफीकुल हसन की अदालत ने भादवि की धारा 302, 396, 307 और आर्म्स एक्ट के तहत दोनों नक्सलियों को दोषी ठहराकर फांसी की सजा सुनाई थी।

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