Samachar Post रिपोर्टर, रांची : हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में बंद एक महिला को विदेशी नागरिकता से जुड़े मामले में पहले सजा और बाद में दोबारा उसी तरह के मामले में बरी किए जाने पर झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार से सवाल किया है। कोर्ट ने पूछा कि जब महिला को वर्ष 2021 में विदेशी अधिनियम के तहत तीन साल की सजा मिली थी, तो वर्ष 2025 में उसके खिलाफ दोबारा इसी एक्ट के तहत मामला क्यों दर्ज किया गया और वर्ष 2026 में उसके बरी होने के बाद सरकार ने इसे चुनौती क्यों नहीं दी?
2021 में विदेशी साबित होने के बाद विदेश क्यों नहीं भेजा?
हाईकोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि अगर महिला को वर्ष 2021 में विदेशी नागरिक माना गया था, तो उसे उसी समय उसके देश क्यों नहीं भेजा गया और उसे हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में क्यों रखा गया। कोर्ट में मौजूद गृह सचिव ने बताया कि महिला को वापस भेजने के लिए सरकार ने उस समय बांग्लादेश सरकार से संपर्क किया था, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद महिला को डिटेंशन सेंटर में रखा गया। मामले की सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता रोहित राय ने कोर्ट से कुछ समय देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि उन्हें सरकार से इस मामले में आवश्यक निर्देश लेना है। इसके बाद कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार को दोपहर 2:15 बजे निर्धारित की।

2018 में दर्ज हुए थे दो मामले
सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि महिला के खिलाफ वर्ष 2018 में दो मामले दर्ज किए गए थे। इनमें एक मामला बच्चे के अपहरण से जुड़ा था, जबकि दूसरा विदेशी अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था। अपहरण से जुड़े मामले में महिला को दो साल की सजा हुई थी। इसके बाद वर्ष 2021 में विदेशी अधिनियम से संबंधित मामले में उसे तीन साल की सजा सुनाई गई। सजा पूरी होने के बाद भी विदेशी नागरिक होने के कारण उसे हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में रखा गया था।
डिटेंशन सेंटर से भागने के बाद फिर दर्ज हुआ केस
सरकार के अनुसार, महिला वर्ष 2025 के अंत में डिटेंशन सेंटर से भाग गई थी। इसके बाद उसके खिलाफ विदेशी अधिनियम से संबंधित एक और मामला दर्ज किया गया। इस मामले में वर्ष 2026 में महिला को बरी कर दिया गया। हाईकोर्ट ने इसी बिंदु पर सवाल उठाया कि जब पहले मामले में महिला को विदेशी नागरिक मानकर सजा दी जा चुकी थी, तो बाद के मामले में वह कैसे बरी हो गई। कोर्ट ने यह भी पूछा कि उसके बरी होने के आदेश के खिलाफ सरकार की ओर से अपील क्यों नहीं की गई। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में हुई। प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता अंकित अपूर्वा ने पक्ष रखा।



















