Samachar Post डेस्क, रांची : झारखंड राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम लिमिटेड (JSFCSCL) की ऑडिट रिपोर्ट में वित्तीय प्रबंधन, धान खरीद और खाद्यान्न वितरण से जुड़ी कई गंभीर अनियमितताओं का खुलासा हुआ है। प्रधान महालेखाकार (लेखापरीक्षा) की रिपोर्ट में निगम के खिलाफ 14 प्रमुख आपत्तियां दर्ज की गई हैं, जिनमें करोड़ों रुपये की लंबित देनदारियां, किसानों के भुगतान में देरी, खाद्यान्न वितरण में कमी और धान खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ियां शामिल हैं। रिपोर्ट का सबसे चर्चित खुलासा पूर्व मंत्री भानू प्रताप शाही से जुड़ा है। ऑडिट के अनुसार वर्ष 2023-24 में सिंदुरिया पैक्स के माध्यम से उनके अलग-अलग किसान आईडी पर निर्धारित 200 क्विंटल की सीमा के मुकाबले 753 क्विंटल धान की खरीद की गई। वहीं वर्ष 2024-25 में प्रसोडीह पैक्स लिमिटेड के जरिए 765 क्विंटल धान की खरीद दर्ज की गई। ऑडिट टीम ने इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा है। वर्ष 2024-25 में निगम को 60 लाख क्विंटल धान खरीदने का लक्ष्य दिया गया था, लेकिन केवल 40.08 लाख क्विंटल धान की खरीद हो सकी। कई जिलों में लक्ष्य प्राप्ति 50 प्रतिशत से भी कम रही। ऑडिट रिपोर्ट में इसे किसानों तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ पहुंचाने में विफलता माना गया है।
किसानों के भुगतान में करोड़ों की देरी
रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 के छह किसानों को पहली किस्त का भुगतान नहीं मिला। वहीं 2024-25 में नौ जिलों के 215 किसानों का करीब 1.33 करोड़ रुपये का भुगतान जनवरी 2026 तक लंबित पाया गया। ऑडिट ने कहा कि भुगतान में देरी से पूरी खरीद व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है। निगम के विभिन्न पर्सनल लेजर (PL) खातों में मशीनरी, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, वाहन और डिजिटल वेटिंग मशीन जैसी योजनाओं के लिए आवंटित 2.25 करोड़ रुपये से अधिक राशि दो वर्षों से अधिक समय से बिना उपयोग के पड़ी हुई है। ऑडिट ने इस पर जवाब मांगा है।
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खाद्यान्न वितरण में 31 हजार क्विंटल से अधिक की कमी
वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान विभिन्न जिलों के लिए जारी आदेश और गोदामों से वास्तविक आपूर्ति के बीच 31,117.58 क्विंटल खाद्यान्न की कमी दर्ज की गई। हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में स्थिति में सुधार बताया गया है, लेकिन इसे गंभीर प्रशासनिक चूक माना गया है। धान खरीद, परिवहन, जूट बैग और अन्य मदों से संबंधित 86.44 करोड़ रुपये का भुगतान अभी तक भारतीय खाद्य निगम (FCI) से नहीं मिला है। रिपोर्ट के अनुसार कई जिलों द्वारा समय पर बिल जमा नहीं करने और प्रभावी फॉलोअप की कमी इसकी प्रमुख वजह है। ऑडिट में पाया गया कि कुछ किसानों से निर्धारित सीमा से अधिक धान खरीदा गया। कई मामलों में एक ही किसान के अलग-अलग Farmer ID पाए गए, जबकि भुगतान से जुड़े दस्तावेजों में भी विसंगतियां सामने आईं। इन मामलों की जांच की सिफारिश की गई है।
बोर्ड बैठक और AGM में भी अनियमितता
कंपनी अधिनियम के अनुसार वर्ष में कम से कम चार बोर्ड बैठकें होना अनिवार्य है, लेकिन 2024-25 में केवल एक बैठक आयोजित की गई। वार्षिक आमसभा (AGM) से जुड़े दस्तावेज भी ऑडिट टीम को उपलब्ध नहीं कराए गए। रिपोर्ट के मुताबिक कई वर्षों के अंतिम ऑडिटेड खाते जमा नहीं किए जाने के कारण केंद्र सरकार ने 63.16 करोड़ रुपये की सब्सिडी रोक रखी है। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में अतिरिक्त कटौती की संभावना भी जताई गई है।

ऑडिट की प्रमुख आपत्तियां
2.25 करोड़ रुपये से अधिक राशि वर्षों से निष्क्रिय। स्टॉक रजिस्टर और परिसंपत्तियों का भौतिक सत्यापन नहीं। खाद्यान्न वितरण में 31,117 क्विंटल से अधिक की कमी। FCI से 86.44 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित। कंपनी अधिनियम के तहत आवश्यक बोर्ड बैठकें नहीं हुईं। धान खरीद में सीमा से अधिक खरीद और डुप्लीकेट Farmer ID के मामले। किसानों के 1.33 करोड़ रुपये से अधिक भुगतान लंबित।
RTI शुल्क की राशि सरकारी खाते में जमा नहीं। बैंक खातों और कैशबुक में बड़े अंतर। 63.16 करोड़ रुपये की केंद्रीय सब्सिडी अटकी।
60 लाख क्विंटल के लक्ष्य के मुकाबले केवल 40.08 लाख क्विंटल धान की खरीद। ऑडिट रिपोर्ट ने निगम की वित्तीय अनुशासन, प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार और निगम इन आपत्तियों पर क्या कार्रवाई करते हैं और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय की जाती है।

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मैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।
