Samachar Post रिपोर्टर, रांची : असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस के बीच चल रही सीट शेयरिंग की बातचीत आखिरकार विफल हो गई। लंबे समय तक चली चर्चा के बावजूद दोनों दल किसी सहमति पर नहीं पहुंच सके। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस सात सीटों से ज्यादा देने को तैयार नहीं थी, जबकि झामुमो 20 सीटों की मांग पर अड़ा रहा। इसी मतभेद के चलते गठबंधन की संभावना खत्म हो गई।
अब अकेले मैदान में उतरेगी जेएमएम
गठबंधन नहीं बनने के बाद झामुमो ने बड़ा फैसला लेते हुए असम में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने बताया कि झामुमो 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जबकि एक सीट भाकपा माले के लिए छोड़ी गई है।
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‘तीर-धनुष’ चिह्न से बढ़ा उत्साह
चुनाव से पहले झामुमो को एक और बड़ी राहत मिली है। पार्टी को असम में भी उसका पारंपरिक ‘तीर-धनुष’ चुनाव चिह्न मिल गया है। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है और पार्टी को उम्मीद है कि इससे मतदाताओं के बीच पहचान मजबूत होगी।
आदिवासी वोट बैंक पर फोकस
झामुमो की रणनीति असम के टी-ट्राइब और आदिवासी वोट बैंक पर केंद्रित है। माना जाता है कि राज्य की 35 से 40 सीटों पर इन मतदाताओं का प्रभाव निर्णायक भूमिका निभाता है। पार्टी पिछले एक साल से इन क्षेत्रों में सक्रिय है। पार्टी के वरिष्ठ नेता हेमंत सोरेन भी दो बार असम का दौरा कर चुके हैं और वहां आदिवासी मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। इसके अलावा मंत्री चमरा लिंडा और सांसद विजय हांसदा की टीम ने भी जमीनी स्तर पर हालात का आकलन किया।
क्या बदलेगा सियासी समीकरण?
झामुमो के इस फैसले के बाद असम की राजनीति में नया मोड़ आ गया है। अब देखना होगा कि पार्टी अकेले चुनाव लड़कर कितना प्रभाव डाल पाती है और चुनावी समीकरण किस दिशा में बदलते हैं।
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मैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।