12.10 करोड़ खर्च के बावजूद अधूरा भवन, CAG रिपोर्ट में झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय की चौंकाने वाली स्थिति

Rupa Kumari | March 17, 2026 | 10:58 AM IST

Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड में शिक्षा और आधारभूत ढांचे से जुड़ी एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय का स्थायी परिसर खूंटी में बनाया जाना था, लेकिन करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद निर्माण अधूरा पड़ा है।

तय समय में पूरा नहीं हुआ प्रोजेक्ट

इस परियोजना की शुरुआत जून 2018 में हुई थी और इसे मई 2020 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन काम पहले धीमा पड़ा और फिर जुलाई 2021 में पूरी तरह बंद हो गया। दिसंबर 2022 तक निर्माण कार्य स्थगित रहा। अब तक इस अधूरे भवन पर राज्य सरकार 12.10 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, लेकिन भवन आज भी अधूरा है।

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अन्य परियोजनाओं में भी गड़बड़ी

CAG (भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि झारखंड भवन निर्माण निगम लिमिटेड की छह अन्य परियोजनाओं में भी काम अधूरा है। इन परियोजनाओं पर 13.32 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद निर्माण कार्य विभिन्न कारणों से रुका हुआ है।

सुतियांबे पहाड़ परियोजना की धीमी रफ्तार

सुतियांबे पहाड़ (पिठौरिया) के विकास कार्य का भी जिक्र रिपोर्ट में किया गया है। यहां अक्टूबर 2017 तक केवल 8% काम ही पूरा हो पाया, जबकि इस पर 2.16 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे।

काम रुकने की बड़ी वजह

रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम के पुनर्मूल्यांकन के निर्देश दिए थे। इसी कारण स्थायी परिसर के निर्माण को रोक दिया गया, ताकि विश्वविद्यालय की वास्तविक जरूरतों का आकलन किया जा सके। हालांकि विभाग से आगे कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिलने के कारण निर्माण केवल 19% तक ही पहुंच पाया और फिर बंद हो गया।

ठेकेदार को भुगतान, लेकिन काम अधूरा

अगस्त 2020 में ठेकेदार ने 58% काम पूरा करने का दावा करते हुए बिल भुगतान की मांग की। निगम ने एक महीने में काम पूरा करने की शर्त पर भुगतान भी कर दिया। लेकिन शर्त पूरी नहीं होने के बावजूद ठेकेदार के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

तीन साल से बेकार पड़ा अधूरा ढांचा

इस लापरवाही का नतीजा यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अधूरा भवन पिछले तीन साल से बेकार पड़ा है। यह मामला सरकारी परियोजनाओं में योजना, निगरानी और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है, जिस पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

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