- अस्पताल प्रबंधन द्वारा निकाले टेंडर में एल-1 हुई एजेंसी का इसी रेट में हुआ चयन
- सिविल सर्जन ने स्वास्थ्य विभाग को राशि बढ़ाने का किया पत्रचार, शेष राशि मिलते ही शुरू होगा ट्रांसप्लांट यूनिट का काम
Samachar Post रिपोर्टर, रांची : सदर अस्पताल में खून संबंधित गंभीर से गंभीर बीमारियों का पूर्ण उपचार जल्द शुरू होगा। राज्य में खून संबंधित कई ऐसे रोग व रोगी हैं जिन्हें पूरी तरह ठीक होने के लिए बोन मेरो ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सदर अस्पताल में राज्य का पहला बोन मेरो ट्रांसप्लांट यूनिट बनने जा रहा है। इसके लिए न केवल टेंडर फाइनल हो चुका है बल्कि निर्माण करने वाली एजेंसी का भी चयन कर लिया गया है। लेकिन पहले यह यूनिट 6.45 करोड़ की राशि से बनना था पर अब यह 10.79 करोड़ से बनेगी। क्योंकि टेंडर के माध्यम से 3 कंपनियाें ने यूनिट के निर्माण से लेकर उसे फंक्शनल बनाने तक की प्रक्रिया में रुचि दिखाई थी, इसमें सबसे कम रेट एसआरएल ट्रेडिंग का था। यह रेट 10.79 करोड़ का था। सबसे कम रेट होने पर एजेंसी का चयन कर लिया गया है। जबकि पूर्व से विभाग द्वारा आवंटित 6.45 करोड़ की राशि को बढ़ाकर 10.79 करोड़ करने के लिए विभाग में पत्राचार भी किया गया है। जैसे ही शेष राशि आवंटित होगी तेजी से यूनिट तैयार करने का कार्य शुरू होगा। सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि चयनित एजेंसी को 3 माह के भीतर काम पूरा करना है। फंड का अलॉटमेंट आते ही एजेंसी काम शुरू करेगी।
हर साल ट्रांसप्लांट के लिए हजारों मरीज जाते है दूसरे महानगर
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि यह यूनिट राज्य के उन हजारों मरीजों के लिए नई उम्मीद बनेगी, जिन्हें अब तक इलाज के लिए दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों की दौड़ लगानी पड़ती थी। सदर अस्पताल में यूनिट शुरू होने के बाद अस्पताल के हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक रंजन समेत अन्य विशेषज्ञ चिकित्सक जिला अस्पताल में ही बोन मैरो ट्रांसप्लांट कर सकेंगे। इससे राज्य के मरीजों को बाहर भेजने की मजबूरी खत्म होगी और इलाज की निरंतरता भी बनी रहेगी।
सातवें तल्ले पर क्यों बनाई जा रही है यूनिट
सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए ऐसा वातावरण जरूरी है, जहां संक्रमण का खतरा न्यूनतम हो और नियंत्रित माहौल विकसित किया जा सके। इसी कारण सदर अस्पताल के सातवें तल्ले को इस यूनिट के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। यहां पर आइसोलेशन जोन, क्लीन रूम, नियंत्रित प्रवेश व्यवस्था और विशेष आईसीयू स्तर की सुविधा विकसित करना अपेक्षाकृत आसान होगा। इसके साथ ही बेहतर एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम और हाई-सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा सकेगा, जो बीएमटी जैसी संवेदनशील प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है।
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यूनिट में होंगी राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुविधाएं
बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट कोई सामान्य वार्ड नहीं होती, बल्कि यह एक हाई-सिक्योरिटी मेडिकल जोन होती है। टेंडर दस्तावेज में कई अत्याधुनिक व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है, जिनमें संक्रमण नियंत्रण के लिए विशेष प्रोटोकॉल, एडवांस्ड एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, सुरक्षित और शुद्ध पानी की व्यवस्था, सेंसर्ड हैंड-फ्री स्टेशन, बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम, आईसीयू-स्तर की मॉनिटरिंग सुविधा, विशेष फर्नीचर और यूटिलिटी सिस्टम आदि शामिल हैं। इन व्यवस्थाओं से स्पष्ट है कि प्रस्तावित यूनिट को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुपर-स्पेशियलिटी स्तर पर विकसित किया जाएगा।
झारखंड में पहली बार सरकारी स्तर पर बड़ी सुविधा
फिलहाल झारखंड के किसी भी सरकारी अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। थैलेसीमिया, ब्लड कैंसर (ल्यूकेमिया), एप्लास्टिक एनीमिया, लिम्फोमा, सिकल सेल जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को मजबूरी में बाहर के राज्यों में इलाज कराना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, सदर अस्पताल में बीएमटी यूनिट शुरू होने के बाद गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों को राज्य में ही इलाज मिलेगा। इलाज की लागत में भारी कमी आएगी। मेडिकल इमरजेंसी में समय पर ट्रांसप्लांट संभव होगा। झारखंड का सरकारी स्वास्थ्य ढांचा सुपर-स्पेशियलिटी स्तर की ओर आगे बढ़ेगा।
इलाज पर होने वाला भारी खर्च होगा कम
वर्तमान में निजी और कॉर्पोरेट अस्पतालों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट का खर्च बेहद अधिक है। बड़े शहरों में एक ट्रांसप्लांट पर औसतन 15 से 30 लाख रुपये तक का खर्च आता है, जबकि जटिल मामलों में यह राशि और बढ़ जाती है। यही कारण है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह इलाज लगभग पहुंच से बाहर हो जाता है। सदर अस्पताल में यह सुविधा शुरू होने के बाद उम्मीद है कि सरकारी स्तर पर यह इलाज काफी कम खर्च में उपलब्ध हो सकेगा।
क्यों जरूरी है बोन मैरो ट्रांसप्लांट?
सदर अस्पताल के हेमेटोलॉजिस्ट डाॅ. अभिषेक रंजन के अनुसार, बोन मैरो ट्रांसप्लांट कई जानलेवा बीमारियों के इलाज का प्रभावी माध्यम है। ब्लड कैंसर, थैलेसीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया और इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारियों में मरीज की अस्थि मज्जा (बोन मैरो) ठीक से काम करना बंद कर देती है। ऐसे मामलों में ट्रांसप्लांट के जरिए नई स्वस्थ स्टेम सेल देकर शरीर में दोबारा रक्त निर्माण की प्रक्रिया शुरू कराई जाती है। सही समय पर ट्रांसप्लांट होने से मरीज को नया जीवन मिलने की संभावना काफी बढ़ जाती है और बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत भी कम हो जाती है।
Reporter | Samachar Post
मैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।