झारखंड ब्रेस्ट, सवाईकल, ब्लड कैंसर की तुलना में ओरल कैंसर के मामले ज्यादा, रिम्स कर रही प्रोजेक्ट में काम; डॉक्टर के बगैर एआई बताएगी मरीज को मुंह का कैंसर है या नहीं

Samachar Post | April 30, 2024 | 03:31 AM IST

रिसर्च के प्रिंसिपल इनवेस्टिगेटर डॉ. एनएन सिंह ने कहा- सिर्फ मुंह देखकर पता लगा पाना संभव नहीं कि रोगी कैंसर की चपेट में है या नहीं, कैंसर की सभी स्लाइड्स की डिजीटल इमेज से एआई देगा इसकी जानकारी
आईसीएमआर के इस पाइनियर प्रोजेक्ट का हिस्सा रिम्स के अलावा देश के 4 अन्य मेडिकल कॉलेज, रिम्स को इसके लिए 1 करोड़ देगी आईसीएमआर- मिल चुकी है 29.33 लाख की पहली ग्रांट

Samachar Post, रांची : झारखंड में अन्य कैंसर की तुलना में ओरल कैंसर (मुंह के कैंसर) के मामले ज्यादा आते हैं। हालांकि सिर्फ झारखंड में ही नहीं, बल्कि देश भर में ओरल कैंसर के रोगियों की संख्या ज्यादा है। एक आंकडें के अनुसार, देश भर में हर साल 77 हजार नए ओरल कैंसर के मामलों की पहचान होती है, जबकि 58 हजार के करीब की मौत इससे हो जाती है। इसकी चपेट में आने वाले 49% मामले तंबाकू सेवन के कारण, 14% स्मोकिंग के कारण, 10% एल्कोहल के कारण और 27% अन्य कारणों वाले होते हैं। अब तक एक्सपर्ट डॉर्क्ट्स ही जांच कर मुंह के कैंसर की पहचान कर पाते हैं, लेकिन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) बताएगा अपको ओरल कैंसर है या नहीं। इसकी एक्यूरेसी भी एक्सपर्ट डॉक्टर्स की तुलना में कई फीसद अधिक होगी। रिम्स में एआई से ओरल कैंसर की पहचान विषय पर रिसर्च की जा रही है। रिसर्च के प्रिंसिपल इनवेस्टिगेटर डेंटल कॉलेज के प्रो. डॉ. एनएन सिंह हैं। 

डॉ. एनएन सिंह ने बताया कि ओरल कैंसर की पहचान साधारण एमबीबीएस-बीडीएस पासआउट नही कर पाते, इसके लिए सुपरस्पेशियलाइजेशन के बाद भी 10 से 15 साल की अनुभव की जरूरत पड़ती है। लेकिन 3-4 साल में एआई का ऐसा प्लेटफॉर्म देश में तैयार किया जा रहा है जिससे ओरल कैंसर की पहचान आसान हो जाएगी। एआई के जरिए सिर्फ रिपोर्ट को तैयार किए सिस्टम में अपलोड करने से एआई बगैर किसी डॉक्टर इंटरवेंशन के बता देगी कि रोगी को मुंह की कैंसर है या नहीं।
कैंसर की पुष्टि के बगैर ही दवाएं शुरू करने से शुरू होने लगती है मरीजों में साइड इफेक्ट
डॉ. एनएन सिंह ने कहा कि अभी कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि कम एक्सपटिज के कारण ओरल कैंसर जिन्हें नही है उनमें भी दवाएं शुरू कर दी जाती है। इसके साइड इफेक्ट के कारण रोगियों की स्थिति भी बिगड़ने लगती है। उन्होंने बताया कि अभी मरीज को देखकर लक्षण के आधार भी उनकी जांच की जाती है। इसके लिए बायोप्सी होती है, इसके बाद जो स्लाइड्स रिपोर्ट मिलते हैं, इसके आधार पर ओरल कैंसर की पुष्टि होती है और इसका इलाज शुरू होता है। ऐसे में आर्टिफिशियल बेस्ट रिपोर्टिंग में ह्यूमन आई से ज्यादा एक्यूरेसी होगी।
इस एआई सिस्टम में अपलोड किए जाएंगे स्लाइड के डिजीटल इमेज
डॉ. एनएन सिंह के अनुसार, कैंसर के मरीजों की जो जांच की जाएगी, उसके रिपोर्ट के स्लाइड्स की डिजीटल इमेज बनाकर एआई के द्वारा एक सिस्टम तैयार करने की कोशिश की जा रही है, जो बगैर डॉक्टर के इंटरवेंशन (हस्तक्षेप) के ओरल कैंसर की पहचान करेगी। एआई के इसी सिस्टम को ट्रेंड करने का काम रिम्स कर रही है।
इस प्रोजेक्ट में रिम्स के अलावा 4 मेडिकल कॉलेज कर रही रिसर्च
आईसीएमआर के इस प्रोजेक्ट में रिम्स के अलावा 4 अन्य मेडिकल कॉलेज व इंस्टीट्यूट काम कर रही है। इसमें एम्स दिल्ली, पीजीआई रोहतक, वैदेही मेडिकल कॉलेज बेंगलुरु, केली मेडिकल कॉलेज बेलगल शामिल हैं। डॉ. एनएन सिंह ने बताया कि रिम्स को इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए आईसीएमआर ने 1 करोड़ के ग्रांट पर मंजूरी दी है। जबकि इसकी पहली किश्त 29.33 लाख रिम्स को प्राप्त हो चुकी है। 
लोकसभा चुनाव के बाद होगी प्रोजेक्ट के लिए मैनपावर की नियुक्ति
इस प्रोजेक्ट में इसी महीने से काम शुरू होना था। लेकिन आचार संहिता के कारण प्रोजेक्ट के लिए होने वाले टेक्नीकल पोस्ट में नियुक्ति नही हो सकी। ऐसे में बिना मैनपावर इसमें काम नही हो सकेगा। डॉ. एनएन सिंह ने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद नियुक्ति की जाएगी जिसके बाद प्रोजेक्ट में गंभीरता से काम शुरू किए जाएंगे।

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