Samachar Post रिपोर्टर, रांची : झारखंड के जंगल अब केवल लकड़ी और बाँस का स्रोत नहीं रह गए हैं, बल्कि कार्बन क्रेडिट के रूप में आर्थिक संपत्ति बन चुके हैं। ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों के लिए यह सवाल उठता है कि जब वायुमंडल में कार्बन का व्यापार शुरू होता है, तो उनके पारंपरिक अधिकार और स्वशासन पर क्या असर पड़ेगा। सरल शब्दों में, कार्बन क्रेडिट का मतलब है कार्बन उत्सर्जन का अधिकार खरीदना या बेचना। कंपनियां अगर निर्धारित सीमा से कम उत्सर्जन करती हैं, तो उन्हें क्रेडिट मिलता है। अधिक उत्सर्जन करने वाली कंपनियां इन क्रेडिट्स को खरीदकर “ग्रीन” होने का दावा करती हैं।इसे कार्बन ऑफसेटिंग कहते हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे प्रदूषण के व्यापार के रूप में भी देखते हैं।
कानूनी स्थिति और सरकारी योजनाएँ
भारत सरकार ने ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 में संशोधन कर कार्बन ट्रेडिंग को वैध किया है। कंपनियां ग्राम सभाओं और वनवासियों से सीधे कार्बन क्रेडिट खरीद सकती हैं। साथ ही ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम के तहत पेड़ लगाने, जल संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने पर पॉइंट्स देकर व्यापार किया जा सकता है। हालांकि, वन अधिकार कानून 2006 और पेसा कानून 1996 में इन व्यापार मॉडलों का कोई उल्लेख नहीं है, जिससे ग्राम सभा की संवैधानिक भूमिका खतरे में पड़ सकती है।
झारखंड के जंगल और सामाजिक परिदृश्य
राज्य के जंगलों में लगभग 222.88 मिलियन टन कार्बन संग्रहीत है। सारंडा का साल वन आदिवासी जीवन, संस्कृति और पारिस्थितिकी का केंद्र है। अगर कार्बन क्रेडिट मॉडल में वन ग्राम सभाओं की भागीदारी नहीं सुनिश्चित की गई, तो पारंपरिक नियंत्रण, लाभ वितरण और स्वशासन कमजोर हो सकता है।
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आदिवासी समुदायों पर प्रभाव
जंगल-भूमि पर नियंत्रण का सवाल: परियोजनाएँ कितने वृक्ष लगेंगे और कितनी अवधि तक रखे जाएंगे तय कर सकती हैं। लाभ वितरण का असमान स्वरूप: कंपनियों और एजेंसियों को अधिक लाभ, जबकि समुदायों को न्यूनतम। स्वशासन में कमी ग्राम सभा की सक्रिय भूमिका सीमित हो सकती है। पर्यावरणीय प्रमाणीकरण का अंतर: वृक्षारोपण और संरक्षण कार्यक्रम वास्तविकता में पूरी तरह सफल नहीं हो सकते।
सारंडा क्षेत्र और खतरे
पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा वन में बड़े उद्योग पहले से खनन कर रहे हैं। वन्यजीव अभयारण्य बनने के बाद स्थानीय लोगों के प्रवेश और उपयोग अधिकार सीमित होंगे। कार्बन व्यापार के साथ जुड़ने पर यह समुदायों के पारंपरिक अधिकारों पर बड़ा दबाव डाल सकता है। कार्बन क्रेडिट-व्यापार हवा को एक वस्तु बना देता है, लेकिन आदिवासी और वन आश्रित समुदाय सदियों से कार्बन को संग्रहित करते आ रहे हैं। उनका जीवन प्राकृतिक रूप से कार्बन न्यूट्रल है। जलवायु न्याय तभी संभव है जब जंगल के असली मालिक वनवासी समुदाय उसकी हवा पर भी अधिकार रखें।
Reporter | Samachar Post
मैंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर मेरा अनुभव फिलहाल एक साल से कम है। सामाचार पोस्ट मीडिया के साथ जुड़कर स्टाफ रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हूं।