Samachar Post रिपोर्टर,रांची :झारखंड के रांची जिले के नामकुम स्थित चुरू गांव में अब रसोई का तरीका पूरी तरह बदल गया है। यहां करीब 20 परिवार अब गोबर से बनने वाली बायोगैस से खाना पका रहे हैं। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की पहल से लगाए गए बायोगैस प्लांट गांव में सस्ती और स्थायी ऊर्जा का स्रोत बन गए हैं।
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LPG से राहत, अब खुद की गैस
ग्रामीणों के मुताबिक पहले LPG सिलेंडर महंगा पड़ता था और समय पर उपलब्ध भी नहीं होता था। अब मवेशियों के गोबर से ही गैस तैयार हो रही है, जिससे सिलेंडर की झंझट खत्म हो गई है। विभाग के अनुसार इस योजना का फायदा उन्हीं परिवारों को दिया जा रहा है जो पशुपालन करते हैं। कम से कम 4–5 मवेशी होना जरूरी है, ताकि नियमित रूप से गोबर मिल सके और गैस उत्पादन जारी रहे।
गैस के साथ जैविक खाद भी
इस बायोगैस प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे गैस के साथ-साथ जैविक खाद भी तैयार हो रही है। इससे किसानों को खेती में फायदा मिल रहा है और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो रही है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 10 किलो गोबर से 30 मिनट तक 20 घरों में चूल्हा जल सकता है, जबकि 50 किलो गोबर से 2–3 घंटे तक गैस मिलती है। यानी सीमित संसाधनों में भी यह सिस्टम प्रभावी साबित हो रहा है। बायोगैस प्लांट के रखरखाव के लिए लाभुकों से हर महीने करीब 100 रुपये लिए जाते हैं। इससे मरम्मत और देखभाल होती है। पहले जहां गैस सिलेंडर पर ज्यादा खर्च होता था, अब बहुत कम लागत में काम चल रहा है।
स्वच्छता और आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
यह पहल स्वच्छ भारत मिशन और गोवर्धन योजना की तर्ज पर चलाई जा रही है। इसका उद्देश्य गांवों में स्वच्छता बढ़ाना और वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देना है। अधिकारियों के अनुसार आने वाले समय में इस योजना को अन्य गांवों में भी लागू किया जाएगा।
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