Samachar Post रिपोर्टर,गुमला :झारखंड में आदिवासी उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुमला में आदिवासी विश्वविद्यालय की स्थापना को अपना व्यक्तिगत संकल्प बताया है। 30 दिसंबर 2025 को गुमला में आयोजित जनसभा में उन्होंने कहा कि यह मांग सिर्फ दिवंगत नेता डॉ. कार्तिक उरांव का सपना नहीं, बल्कि उनकी अपनी प्रतिबद्धता भी है, जिसे पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास जारी हैं।
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जमशेदपुर के बाद गुमला बनेगा आदिवासी उच्च शिक्षा का दूसरा बड़ा केंद्र
झारखंड विधानसभा पहले ही पंडित रघुनाथ मुर्मू जनजातीय विश्वविद्यालय विधेयक पारित कर चुकी है, जिसका मुख्यालय जमशेदपुर में प्रस्तावित है। यह राज्य का दूसरा आदिवासी विश्वविद्यालय होगा, जबकि गुमला में प्रस्तावित नया विश्वविद्यालय आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा की पहुँच और अवसरों को और मजबूत करेगा।
सांस्कृतिक जड़ों के साथ आधुनिक शिक्षा अपनाने की अपील
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि शिक्षा आदिवासी समाज के विकास, पहचान और आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए तकनीक, आधुनिक शिक्षा और नवाचार को अपनाएँ, ताकि वे बदलते समय में नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। उन्होंने विश्वविद्यालय स्थापना से जुड़े भूमि विवाद और संसाधन संबंधी चुनौतियों के समाधान के लिए सरकार और प्रशासन को सहयोग देने का भरोसा दिलाया। राष्ट्रपति ने कहा कि स्थानीय और राज्य सरकार का साथ इस परियोजना को निर्णायक गति देगा।
‘कार्तिक जतरा 2025’ में भी गूंजी शिक्षा और संस्कृति की बात
अपने झारखंड दौरे के दौरान राष्ट्रपति रायडीह में आयोजित दो दिवसीय अंतरराज्यीय सांस्कृतिक समागम ‘कार्तिक जतरा 2025’ में भी शामिल हुईं। इस दौरान उन्होंने संस्कृति और शिक्षा के संतुलन को समाज की प्रगति का आधार बताया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार, छत्तीसगढ़ CM विष्णु देव साय और कई गणमान्य उपस्थित रहे।
पहली आदिवासी राष्ट्रपति की प्रतिबद्धता, राज्य में दूरगामी असर
संथाल आदिवासी परिवार से आने वाली द्रौपदी मुर्मू भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति हैं। आदिवासी शिक्षा, संस्कृति और सशक्तिकरण को लेकर दिया गया उनका संदेश झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए नीति और सामाजिक स्तर पर दूरगामी प्रभाव रखता है।
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